कृष्ण-अर्जुन bf7c5f9c-8e99-40a4-8fbc-6864df36965c
धर्म/राशिफल

शरीर नहीं, दृष्टि हैं कृष्ण !

जब मनुष्य का विवेक भय, मोह, लोभ, अहंकार और स्वार्थ की बेड़ियों में कैद हो जाता है, तब उसके भीतर कृष्ण-चेतना का जन्म आवश्यक हो जाता है।

जन्माष्टमी केवल श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव नहीं, उस चेतना के प्रकट होने का पर्व है, जो मनुष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर, मोह से विवेक की ओर और स्वार्थ से सत्य की ओर ले जाती है। कृष्ण का कारागार में  जन्म भी गहरा प्रतीक है। जब मनुष्य का विवेक भय, मोह, लोभ, अहंकार और स्वार्थ की बेड़ियों में कैद हो जाता है, तब उसके भीतर कृष्ण-चेतना का जन्म आवश्यक हो जाता है।

कृष्ण उस परम चेतना के प्रतीक हैं, जो जीवन के प्रत्येक द्वंद्व में मनुष्य का मार्गदर्शन करती है।

कृष्ण को केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्व, राजा, कूटनीतिज्ञ या देवता के रूप में देखना उनके विराट स्वरूप की अवहेलना होगी। कृष्ण उस परम चेतना के प्रतीक हैं, जो जीवन के प्रत्येक द्वंद्व में मनुष्य का मार्गदर्शन करती है। इस दृष्टि से महाभारत केवल कौरवों और पांडवों का युद्ध नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले धर्म और अधर्म, विवेक और अविवेक तथा सत्य और मोह के संघर्ष का भी विराट आख्यान है।

परमात्मा मनुष्य की यात्रा अपने हाथ में नहीं लेता, वह उसे सही दिशा में चलने का विवेक देता है।

महाभारत को यदि संसार का दर्पण माना जाए तो उसमें दिखाई देने वाला कुरुक्षेत्र वस्तुतः हमारा अपना जीवन है। धृतराष्ट्र का अंधत्व केवल आंखों का अंधत्व नहीं, पुत्रमोह और सत्ता-मोह का प्रतीक है। दुर्योधन अहंकार और अधिकार की अंधी भूख का प्रतिनिधि है। शकुनि छल और षड्यंत्र की प्रवृत्ति का प्रतीक है। 

अर्जुन क्या है ?अर्जुन स्वयं संसार है। वह सामर्थ्यवान, लेकिन संशयग्रस्त है। उसके पास शस्त्र हैं, परंतु निर्णय का साहस नहीं। वह कर्तव्य जानता है, लेकिन मोह उसे रोक देता है। अपने ही संबंधों, भावनाओं और आशंकाओं के बीच खड़ा अर्जुन उस सामान्य मनुष्य का प्रतीक है जो जीवन के कठिन मोड़ पर पूछता है-क्या करूं? किसे सही मानूं ? मेरा धर्म क्या है ? तब उसके सामने कृष्ण खड़े होते हैं।

कृष्ण सारथी अर्थात मार्ग दिखाने वाले हैं। वे अर्जुन का जीवन अपने हाथ में नहीं लेते, बल्कि उसे दिशा देते हैं। यही कृष्ण का सबसे बड़ा आध्यात्मिक संदेश है-परमात्मा मनुष्य की यात्रा अपने हाथ में नहीं लेता, वह उसे सही दिशा में चलने का विवेक देता है।

गीता वास्तव में मनुष्य के भीतर के अंधकार से संवाद है
गीता को केवल युद्ध का उपदेश मानना उसके संदेश को छोटा कर देना होगा

कुरुक्षेत्र में कृष्ण का सबसे बड़ा चमत्कार अस्त्र चलाना नहीं, बल्कि अर्जुन के भीतर सोए  विवेक को जगाना है। अर्जुन युद्धभूमि से भागना चाहता है। कृष्ण उसे युद्ध के लिए उकसाते  नहीं, बल्कि कर्म, आत्मा, कर्तव्य, मोह, ज्ञान और निष्कामता का अर्थ समझाते हैं। गीता इसी संवाद का नाम है। इसलिए गीता को केवल युद्ध का उपदेश मानना उसके संदेश को छोटा कर देना होगा। गीता वास्तव में मनुष्य के भीतर के अंधकार से संवाद है।

गीता केवल अर्जुन के लिए नहीं थी। अर्जुन के माध्यम से कृष्ण संसार की आत्मा को जगा रहे थे।

कृष्ण आत्मा की अमरता का बोध कराते हैं। वे कर्म का महत्व बताते हैं, लेकिन कर्मफल के मोह से मुक्त होने की प्रेरणा भी देते हैं। वे ज्ञान का मार्ग दिखाते हैं, भक्ति का मार्ग बताते हैं और अंततः मनुष्य को अपने विवेक से निर्णय लेने की स्वतंत्रता देते हैं। इसीलिए गीता केवल अर्जुन के लिए नहीं थी। अर्जुन के माध्यम से कृष्ण संसार की आत्मा को जगा रहे थे। महाभारत भी इसी सत्य की ओर संकेत करता है। वह केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि सांसारिक विकारों के चरम परिणाम का प्रतीक है।जहां लोभ है, वहां संघर्ष है।जहां अहंकार है, वहां विनाश है। जहां मोह विवेक पर भारी पड़ता है, वहां निर्णय भ्रष्ट होते हैं। जहां सत्ता धर्म से बड़ी हो जाती है, वहां कुरुक्षेत्र जन्म लेता है। महाभारत इसलिए हुआ क्योंकि मनुष्य के भीतर के विकार सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था पर हावी हो गए थे। द्यूत, छल, अपमान, अधिकार की लालसा, प्रतिशोध और सत्ता की भूख ने ऐसे संघर्ष को जन्म दिया जिसमें अंततः पूरा समाज दहक उठा।

हमारा कुरुक्षेत्र कहां है?

आज प्रश्न यह नहीं है कि कुरुक्षेत्र कहां था। प्रश्न यह है कि हमारा कुरुक्षेत्र कहां है?आज भी मनुष्य के सामने वही अर्जुन-सदृश प्रश्न खड़े हैं। परिवार में संबंध और स्वार्थ का संघर्ष है। राजनीति में सत्ता और सेवा का संघर्ष है। व्यापार में लाभ और नैतिकता का संघर्ष है। डिजिटल संसार में सूचना और भ्रम का संघर्ष है। मनुष्य के भीतर सुख की आकांक्षा और मानसिक अशांति का संघर्ष है। ऐसे में कृष्ण की आवश्यकता पहले से अधिक है।कृष्ण को बाहर खोजने से पहले भीतर खोजने की आवश्यकता है।

कृष्ण की बांसुरी भी एक सुंदर प्रतीक है। बांसुरी भीतर से खोखली होती है, तभी उसमें से संगीत निकलता है। मनुष्य भी जब अहंकार, स्वार्थ और विकारों से स्वयं को खाली करता है, तभी उसके भीतर परम चेतना का संगीत सुनाई देने लगता है।

कृष्ण हमारे भीतर का वह विवेक हैं, जो गलत से हमें रोकता है। वे वह अंतरात्मा हैं, जो अकेले में भी सही और गलत का अंतर बताती है। वे वह चेतना हैं, जो सफलता मिलने पर अहंकार से बचाती है और असफलता मिलने पर निराशा से। कृष्ण की बांसुरी भी एक सुंदर प्रतीक है। बांसुरी भीतर से खोखली होती है, तभी उसमें से संगीत निकलता है। मनुष्य भी जब अहंकार, स्वार्थ और विकारों से स्वयं को खाली करता है, तभी उसके भीतर परम चेतना का संगीत सुनाई देने लगता है। आज के युग में कृष्ण इसलिए आवश्यक हैं क्योंकि हमारी समस्याएं आधुनिक हो गई हैं, लेकिन मनुष्य के विकार पुराने ही हैं।

आज की गीता पूछती है-क्या हमारे पास अर्जुन जैसी जिज्ञासा है और कृष्ण की बात सुनने जैसा धैर्य ?

आज कुरुक्षेत्र में रथों की जगह मशीनें हैं, शस्त्रों की जगह तकनीक है और द्यूत की जगह डिजिटल संसार के अनेक आकर्षण हैं; लेकिन लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार और स्वार्थ आज भी मनुष्य को उसी तरह संचालित करते हैं इसलिए आज की गीता पूछती है-क्या हमारे पास अर्जुन जैसी जिज्ञासा है और कृष्ण की बात सुनने जैसा धैर्य ?

कृष्ण हमें संसार छोड़ने का संदेश नहीं देते। वे संसार में रहते हुए सात्विक जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। वे कर्म से पलायन नहीं, कर्म की शुद्धता चाहते हैं। वे संबंधों से विमुख होने को नहीं कहते, बल्कि मोह और कर्तव्य के बीच अंतर समझाते हैं।

जन्माष्टमी का वास्तविक अर्थ यही है कि हम अपने भीतर उस कृष्ण का जन्म कराएं, जो हमारे निर्णयों का सारथी बने। जब अहंकार हमें दूसरों से बड़ा समझाने लगे और अंतरात्मा विनम्रता की ओर ले जाए-यही कृष्ण हैं। जब निराशा हमें कर्म से विमुख करे और भीतर से कोई शक्ति कहे कि अपना कर्तव्य करते रहो-यही कृष्ण हैं।

कृष्ण का वास्तविक जन्म तब होगा, जब हमारे भीतर का अर्जुन जागेगा, मोह से ऊपर उठेगा

कृष्ण केवल मथुरा में जन्म लेने वाली देह मात्र नहीं एक चेतना हैं, दृष्टि हैं,विवेक हैं, आत्मा की वह आवाज हैं जो मनुष्य को उसके श्रेष्ठतम ओर ले जाती है। हर उस मन में, जहां अंधकार है, कृष्ण का जन्म आवश्यक है। हर उस जीवन में, जहां मोह है, कृष्ण की आवश्यकता है। हर उस समाज में, जहां अन्याय है, कृष्ण-चेतना आवश्यक है। कृष्ण का वास्तविक जन्म तब होगा, जब हमारे भीतर का अर्जुन जागेगा, मोह से ऊपर उठेगा और अपनी आत्मा की आवाज सुनकर सात्विक कर्म के मार्ग पर चल पड़ेगा। (युवराज) -डॉ घनश्याम बादल

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