आत्मा अमर है, न यह जन्म लेती है, न ही इसकी मृत्यु होती है। आत्मा एक शाश्वत ऊर्जा है जिसे आत्म ज्ञान और दिव्य ज्ञान के माध्यम से जाना जा सकता है। जिस प्रकार शरीर में जब तक आत्मा का वास है तब तक वह जीवित है।
सनातन धर्म जीवन जीने की कला है। यह हमको बताता है कि सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। अर्थात, हर व्यक्ति को ईश्वर तक पहुँचने का अपना मार्ग चुनने की स्वतंत्रता है।
सनातन वैदिक सभ्यता एक ऐसी जीवंत सभ्यता है जो भारत में चिरकाल से चली आ रही है जिसकी आत्मा “सनातन धर्म” में बसती है। सनातन धर्म जीवन जीने की कला है। यह हमको बताता है कि सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं। अर्थात, हर व्यक्ति को ईश्वर तक पहुँचने का अपना मार्ग चुनने की स्वतंत्रता है। यह विचार पूरे ब्रह्मांड के नियमों, ज्ञान और अनुभवों से उत्पन्न हुआ है। इसमें विचारों की स्वछंदता और ज्ञान को महत्व दिया गया है।
मंदिर समाज की आत्मा थे, जहाँ पूजा-अर्चना के साथ-साथ चरित्र निर्माण भी होता था। हर मंदिर ज्ञान का द्वार था, जहां बच्चों को शिक्षा दी जाती थी। मंदिर जाने का उद्देश्य अपने अहंकार का नाश, मन की शुद्धि और भगवान की आराधना के माध्यम से ज्ञान की ज्योति जलाए रखना था।
हमारे मंदिर केवल पूजा स्थल ही नहीं, यह ज्ञान, विज्ञान, नवविचार, योग, संस्कार और समाज के केंद्र थे। यहाँ भगवान की आराधना ही नहीं, बल्कि जीवन मूल्य सिखाए जाते थे। हमारे पूर्वज मंदिरों में संगीत, योग, आयुर्वेद, खगोल विज्ञान, और दर्शन जैसे विषयों की शिक्षा देते थे। मंदिर समाज की आत्मा थे, जहाँ पूजा-अर्चना के साथ-साथ चरित्र निर्माण भी होता था। हर मंदिर ज्ञान का द्वार था, जहां बच्चों को शिक्षा दी जाती थी। मंदिर जाने का उद्देश्य अपने अहंकार का नाश, मन की शुद्धि और भगवान की आराधना के माध्यम से ज्ञान की ज्योति जलाए रखना था।
हमारे देवी-देवता धर्म, कर्म और संतुलन के नायक हैं। भगवान श्रीराम अपनी मर्यादा के कारण मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए और उन्होंने स्वयं रावण से युद्ध कर उसका नाश किया, जिससे कर्म की प्रेरणा मिली। भगवान कृष्ण ने ‘कर्म करो, फल की इच्छा मत करो’ का अमूल्य ज्ञान दिया। भगवान शिव ने ध्यान और संयम का संदेश दिया, तो माँ दुर्गा ने अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस। हमारे देवी-देवता प्रकृति के नियमों के प्रतीक हैं जो हमारे ऋषि-मुनि आम बोल चाल और प्रतीकों की भाषा में जनसाधारण को समझाना चाहते थे। धर्म वह है जो जीवन और प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करे। सनातन धर्म ने हमें सिखाया कि पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि, वृक्ष, पशु, सबमें ईश्वर का वास है।
हमारे ज्यादातर बच्चों को वेद और उपनिषद के नाम तक नहीं पता। वो असली ज्ञान विज्ञान से अनजान हैं।
आज दु:ख की बात यह है कि हमारे बच्चे, जो दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता के उत्तराधिकारी हैं, वे अपने ही धर्म को नहीं जान पा रहे हैं। इसका कारण है कि उन्हें उनके माता-पिता और गुरुजन सनातन धर्म का विज्ञान नहीं सिखा रहे हैं, केवल कहानियाँ सुनाई और पूजा-पाठ बताया जा रहा है। हमारे ज्यादातर बच्चों को वेद और उपनिषद के नाम तक नहीं पता। वो असली ज्ञान विज्ञान से अनजान हैं। वेद हमारे प्राचीनतम और सर्वोच्च ज्ञान ग्रंथ हैं। “वेद” का अर्थ है ज्ञान और ये चार “ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद” हैं। उपनिषद वेदों का सार हैं जो हमारे ऋषि-मुनियों ने जनसाधारण को वेदों को सरल और कहानियों के माध्यम से समझाने के लिए रचे जिसमें गुरु, शिष्य का संवाद प्रश्न उत्तर के रूप में है। इन्हें “वेदांत” कहा जाता है, क्योंकि ये वेदों के अंतिम और सबसे गहन भाग हैं जो बाहरी कर्मकांड से आगे बढ़कर आत्मा, ईश्वर और परम सत्य की खोज कराते हैं। ब्राह्मण (ज्ञानी) उसे आचरण में लाकर देश, राष्ट्र, समाज और स्वयं को समृद्ध बनाते हैं।
वेदों में कहा गया है कि जब सृष्टि का आरंभ हुआ, तो सबसे पहले “ऊँ” की नाद (ध्वनि) गूँजी और उसी से सभी तत्व, ऊर्जा और चेतना का जन्म हुआ।
आपने अक्सर लोगों को ऊँ का जाप करते सुना और देखा होगा। आखिर यह ऊँ है क्या? इसको संक्षेप में समझते है। ऊँ (ओम्) सृष्टि की आदि ध्वनि है इसे “प्रणव” कहते है। वेदों में कहा गया है कि जब सृष्टि का आरंभ हुआ, तो सबसे पहले “ऊँ” की नाद (ध्वनि) गूँजी और उसी से सभी तत्व, ऊर्जा और चेतना का जन्म हुआ। वैज्ञानिको ने पता लगाया है की सूर्य से निकलने वाली ध्वनि ऊँ का ही नाद करती है। यह तीन अक्षरों से बना है, “अ”, “उ”, “म” जो क्रमशः जाग्रत (सचेत), स्वप्न (अर्धचेतन) और सुषुप्ति (अवचेतन) अवस्थाओं का प्रतीक हैं। “ ऊँ ” ही ईश्वर है। वहीं “स्वाहा” शब्द यज्ञ और मंत्रों के अंत में प्रयुक्त होने वाला शब्द मात्र नहीं इसका अर्थ है “जो कहा गया, वह अब अर्पित है।” जो मंत्र हमने अपने मुख, जिभ्या से बोले है वही सत्य हमारी अंतरात्मा में समा जाए। यह केवल शब्द नहीं, बल्कि स्पंदन बनकर हमारे शरीर, मन और आत्मा में उतर जाए। प्रदीप कुमार राजपूत(सुमन सागर)