इस संसार में संस्कारों से बढ़कर अन्य कोई दौलत नहीं हो सकती। धन-दौलत आज है और कल समाप्त हो सकता है, परंतु मनुष्य के अच्छे संस्कार और व्यवहार जीवनकाल में भी और इस संसार से विदा लेने के पश्चात भी बने रहते हैं। यही मनुष्य की असली पूँजी है, जो कठिन से कठिन समय में भी उसे टूटने नहीं देती और समाज में उसका नाम रोशन करती है।
हमारी भारतीय संस्कृति हमें यही शिक्षा देती है कि अतिथि को देवता मानते हुए उनका सदा सम्मान करना चाहिए। इसके विपरीत, जिन लोगों में संस्कार और सदाचरण की कमी होती है, वे ही दूसरों को अपने घर बुलाकर अपमानित करने का नीच यत्न करते हैं। मनुष्य की असली पहचान उसके बैंक बैलेंस से नहीं, बल्कि उसके बातचीत के ढंग और बड़ों के प्रति आदर भाव से होती है।
मनुष्य के जीवन में संस्कारों का मुख्य अर्थ व्यक्तित्व का शुद्धिकरण और सही आचरण सीखना है। संस्कार व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करते हैं, उसे सही और गलत का भेद समझाते हैं तथा समाज का एक जिम्मेदार नागरिक बनाने में मदद करते हैं। इनसे मन और विचारों में श्रेष्ठ गुणों का स्वाभाविक विकास होता है।
यदि कोई व्यक्ति किसी को धोखा देने में सफल हो जाता है, तो उसे इसे अपनी जीत मानकर जश्न नहीं मनाना चाहिए। उस परमेश्वर के यहाँ देर हो सकती है पर अंधेर नहीं; वह परम न्यायकारी प्रभु हर बुराई का फैसला अवश्य करता है। जब उसके धोखे का उत्तर ऊपर वाला देता है, तो उसे सहन करना अत्यंत कठिन हो जाता है।
मनुष्य का सच्चा हितैषी उसकी अच्छाइयों पर शाबासी देता है, बुराइयों में उचित परामर्श देता है और विचारों का आदान-प्रदान करता है। इसके विपरीत, धोखा देने की प्रवृत्ति वाला व्यक्ति केवल चिकनी-चुपड़ी बातें करके अपना स्वार्थ सिद्ध करता है। वहीं, योग्य व्यक्ति जीवन में न तो किसी से दबते हैं और न ही किसी को दबाते हैं।
संसार का यह नियम बन गया है कि वह असफल लोगों का तिरस्कार करता है और सफल लोगों से ईर्ष्या। कुछ लोग विवशताओं के कारण पूरा जीवन अभावों में जीते हुए जीते-जी मर जाते हैं, जबकि कुछ श्रेष्ठ लोग अपने महान सत्कार्यों के बल पर मरने के बाद भी अमर हो जाते हैं और इतिहास युगों-युगों तक उनका स्मरण करता है।
आज समाज में लोग केवल अपनी आवश्यकताओं और स्वार्थ के लिए एक-दूसरे से जुड़ते हैं। यहाँ तक कि सृष्टि के रचयिता ईश्वर को भी लोग केवल जरूरत पड़ने पर ही याद करते हैं। अहंकार और स्वार्थ में डूबा मनुष्य दूसरों को सम्मान नहीं देना चाहता, और जहाँ स्वार्थ टकराने लगते हैं, वहाँ प्यार और अपनापन समाप्त हो जाता है।
इंसानी चरित्र में गिरावट का आलम यह है कि श्मशान जैसी गंभीर जगह पर भी मनुष्य ऊबने लगता है और अपनों से ही पूछने लगता है कि और कितना समय लगेगा। मनुष्य अपनी संवेदनाएँ खोता जा रहा है और उसका मन संकुचित होता जा रहा है। लोग हिसाब-किताब रखकर ही दिल में जगह देना चाहते हैं, जो कि अत्यंत संकीर्ण सोच है।
सार रूप में, मनुष्य की सच्ची संपत्ति धन-दौलत न होकर अच्छे संस्कार और ईमानदारी ही है। ईश्वर का अंश होते हुए भी मनुष्य ईश्वरीय गुणों से दूर भाग रहा है। जब तक मनुष्य अपनी आँखों से स्वार्थ का चश्मा हटाकर अपने हृदय को विशाल नहीं बनाएगा, तब तक उसे सृष्टि के वास्तविक सौंदर्य का बोध नहीं हो सकता। (उर्वशी)