मनुष्य को क्रोध या अहंकार की स्थिति में कभी भी कोई महत्वपूर्ण निर्णय नहीं लेना चाहिए। क्रोध मनुष्य के विवेक को हर लेता है, जिससे सही और गलत का अंतर मिट जाता है और सोच-समझकर निर्णय लेने की क्षमता समाप्त हो जाती है। इस आवेग में लिए गए गलत फैसले और बोले गए कड़वे शब्द अपनों को दूर कर देते हैं। परिणामस्वरूप, व्यक्ति को जीवनभर पश्चाताप और अवसाद का सामना करना पड़ता है।
जिस प्रकार अत्यधिक क्रोध हानिकारक है, उसी प्रकार अत्यधिक प्रसन्नता में आकर किसी से वादा नहीं करना चाहिए। बहुत अधिक खुशी के क्षणों में मनुष्य यथार्थ से दूर हो जाता है और भावनाओं में बहकर ऐसे वादे कर बैठता है जो बाद में उसके लिए भारी बोझ या "जी का जंजाल" बन जाते हैं। रामायण में महाराज दशरथ की स्थिति इसका प्रमुख उदाहरण है। समझदारी इसी में है कि व्यक्ति हमेशा सोच-समझकर ही वचन दे।
यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर आपको क्रोध दिलाने का प्रयास कर रहा है, तो उसके झांसे में आने से बचना चाहिए। यदि वह आपको गुस्सा दिलाने में सफल हो जाता है, तो आप उसके हाथ की कठपुतली बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में वह आपसे नैतिक या अनैतिक कोई भी मनचाहा कार्य करवा सकता है और आपको अपने नियंत्रण में रख सकता है।
क्रोध की अति मनुष्य में प्रतिशोध की भावना भर देती है। उदाहरण के लिए, दुर्वासा ऋषि अपने अत्यधिक क्रोध के कारण ही उचित सम्मान पाने से वंचित रह गए। क्रोध के आवेग में आकर मनुष्य कई बार अपराध (जैसे हत्या) तक कर बैठता है और जीवनभर के लिए जेल की सलाखों के पीछे पहुँच जाता है। ऐसे समय में वही परिवार और मित्र उससे दूरी बना लेते हैं जिनके लिए उसने अपना सब कुछ दांव पर लगाया था।
अत्यधिक प्रसन्नता में मनुष्य स्वयं को सर्वशक्तिमान या अजेय मानने की भूल कर बैठता है। इस घमंड या अति-उत्साह की स्थिति में लिया गया कोई अदूरदर्शी फैसला भविष्य में उसके लिए गहरा दुख ला सकता है। जब परिस्थितियाँ बदलती हैं, तो व्यक्ति असहाय होकर केवल हाथ मलता रह जाता है और उसकी बुद्धि कोई समाधान नहीं खोज पाती।
क्रोध आने पर त्वरित प्रतिक्रिया देने से बचना चाहिए। ऐसी स्थिति में कुछ क्षणों के लिए रुक जाना, गहरी सांस लेना और उस व्यक्ति या स्थान से थोड़ी देर के लिए दूर चले जाना अत्यंत प्रभावी उपाय है। जब तक मन शांत न हो जाए, तब तक किसी भी बहस या प्रतिक्रिया से खुद को दूर रखना ही बुद्धिमानी है।
मनुष्य के जीवन में चाहे क्रोध का आवेग हो या अत्यधिक प्रसन्नता की स्थिति-दोनों ही अति नुकसानदेह हैं। क्रोध विनाश का रूप है और अति-प्रसन्नता भी असावधानी के कारण पतन का कारण बन सकती है। अतः जीवन में हर परिस्थिति में स्वयं पर संयम और संतुलन बनाए रखना ही वास्तविक समझदारी और सर्वांगीण कल्याण का मार्ग है।
(उर्वशी)चन्द्र प्रभा सूद