दुःख की पराकाष्ठा और मानवीय संवेदना का संकट AI
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दुःख की पराकाष्ठा और मानवीय संवेदना का संकट

अध्यात्म

दु:ख की पराकाष्ठा जब हो जाती है तब उस समय मनुष्य स्वयं को असहाय अनुभव करने लगता है। उसकी उस स्थिति में अपने साथ नहीं निभा पाते अथवा निभाना नहीं चाहते। तब अपनों से बेज़ार होकर, वह सबसे कटकर अलग-थलग हो जाता है। रिश्तों को निभाने के उसके सभी प्रयास खोखले दिखाई देने लगते हैं।

दु:ख तब उत्पन्न होता है जब इच्छाएं, अपेक्षाएं या परिस्थितियां मनुष्य के अनुकूल नहीं होतीं।

वास्तव में दु:ख एक मानसिक, शारीरिक अथवा भावनात्मक कष्ट की अवस्था है। दु:ख तब उत्पन्न होता है जब इच्छाएं, अपेक्षाएं या परिस्थितियां मनुष्य के अनुकूल नहीं होतीं। यह किसी महत्वपूर्ण हानि जैसे किसी प्रियजन की मृत्यु का होना, किसी रिश्ते के टूटने या असफलता के कारण होने वाली एक प्राकृतिक और भावनात्मक प्रतिक्रिया है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि दुख मन की वह व्याकुलता है जो किसी हानि या प्रतिकूल परिस्थिति के कारण पैदा होती है। यह स्थिति व्यक्ति को व्यथित करती रहती है।

मनीषी कहते हैं कि ऐसे कठिन समय में जब अपनी परछाई तक साथ छोड़ देती है, तब मनुष्य अनहोनी के भय से कदम-कदम पर चौंकने लगता है। अपनों के प्यार-दुलार से ठुकराए जाते हुए मनुष्य को कहीं ठौर नहीं मिलता। ऐसे कष्ट के समय पति को अपनी पत्नी का और पत्नी को अपने पति का सहारा मिल जाए तो ईश्वर की बड़ी कृपा समझो। यदि उनके बच्चे माता अथवा पिता के दु:ख को समझने वाले हों और उन्हें सहारा देने वाले हों तो सोने पर सुहागे जैसी स्थिति बन जाती है। मनुष्य अपने दु:खों से जूझने में एक हद तक सफल हो जाता है।

अपने दु:ख के विषय में हर समय सोचते रहने पर मनुष्य को लगने लगता है कि उसके मनोमस्तिष्क पर उसके दु:ख की सोच हावी होती जा रही है।

दु:ख एक अस्थायी स्थिति है परन्तु इसे स्थायी मान लेने पर व्यक्ति बहुत अधिक दु:खी हो जाता है। दु:ख केवल दु:खद भावनाओं तक सीमित नहीं होता बल्कि इसमें शारीरिक पीड़ा, अवसाद, और मानसिक अशान्ति को भी शामिल किया जा सकता है। अपने दु:ख के विषय में हर समय सोचते रहने पर मनुष्य को लगने लगता है कि उसके मनोमस्तिष्क पर उसके दु:ख की सोच हावी होती जा रही है। अधिक तनाव में आ जाने के कारण उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसके मस्तिष्क की नसें फट जाएंगी। उस समय मनुष्य किसी को भी अपनी व्यथा कथा सुनाकर अपने मन को हल्का कर‌ लेना चाहता है।

इसी भाव को पुष्ट करती हुई एक कहानी का स्मरण हो रहा है जो कभी स्कूल में पढ़ी थी। यह कथा अंग्रेजी भाषा की पुस्तक में थी। कहानी का या उसके लेखक का नाम भी याद नहीं। कहानी के नायक के दु:ख का कारण भी याद नहीं है। पर वह घटना मन को इतना छू गई थी कि यदा कदा याद आ जाती है कि एक इन्सान दूसरे इन्सान के प्रति इतना सम्वेदनाहीन कैसे हो सकता है ?

रात के समय घर जाकर घोड़े को बांधता है और उसे खाने के लिए दाना देता है । उस समय वह अपने घोड़े के पास बैठ जाता है और अपने मन की भड़ास, अपनी व्यथा की कथा और दिन में अपने साथ होने वाले अत्याचार की कहानी अपने उस घोड़े को सुनाकर अपना मन हल्का करता है।

यह कहानी एक तांगा चलाने वाले गरीब व्यक्ति की है। लोगों की नजर में जिसकी कोई कीमत नहीं होती। दिनभर उसके तांगे पर सवारियां चढ़ती और उतरती रहती हैं। तांगे में बैठे सभी लोग अपनी किसी-न-किसी समस्या को डिस्कस करते रहते हैं। वह भी अपनी समझ के अनुसार उन्हें उत्तर देता रहता है। उनकी बातें या समस्याएं सुनकर वह भी अपनी परेशानी को उनसे बाँटना चाहता है किन्तु उसकी बात सुनने के लिए कोई भी सवारी तैयार नहीं होती। कोई उसे गाली देता है तो कोई उसे झिड़ककर चुप करा देता है। हद तो तब होती है जब अपनी व्यथा सुनाने के कसूर में एक सवारी उसे लात मारकर चुप कराती है। मानो वह इन्सान नहीं या उसके मन को कष्ट नहीं होता । दिनभर वह अपने मन में अतीव कष्ट का अनुभव करता है ।

रात के समय घर जाकर घोड़े को बांधता है और उसे खाने के लिए दाना देता है । उस समय वह अपने घोड़े के पास बैठ जाता है और अपने मन की भड़ास, अपनी व्यथा की कथा और दिन में अपने साथ होने वाले अत्याचार की कहानी अपने उस घोड़े को सुनाकर अपना मन हल्का करता है ।

कोई भी दूसरे की परेशानी को अथवा दु:ख को समझना ही नहीं चाहता। हां, दूसरे की खिल्ली उड़ाने के लिए, नमक-मिर्च लगाकर चटखारे लेने के लिए लोग जानकारी जुटाने में महारत हासिल कर रहे हैं।

इस कहानी के याद रह जाने का कारण है कि आज लोग स्वार्थी होते जा रहे हैं। अपना कष्ट सबको बड़ा लगता है। दूसरे का कष्ट उनकी दृष्टि में कुछ महत्त्व ही नहीं रखता। उनकी सम्वेदनाएं मानो मरती जा रही हैं। कोई भी दूसरे की परेशानी को अथवा दु:ख को समझना ही नहीं चाहता। हां, दूसरे की खिल्ली उड़ाने के लिए, नमक-मिर्च लगाकर चटखारे लेने के लिए लोग जानकारी जुटाने में महारत हासिल कर रहे हैं। इससे उनके झूठे अहं को शान्ति मिलती है। वे भूल जाते हैं कि यदि वे कष्ट में हों और दूसरे लोग उनसे वैसा व्यवहार करेंगे तब उनकी स्थिति कैसी होगी ?

किसी के दु:ख में बेशक साझेदार न बनो पर उनसे सहानुभूति के दो बोल तो बोले जा सकते हैं। दूसरे के दुख पर मलहम लगाने वाला छोटा नहीं हो जाता बल्कि महान होता है। सुख और दु:ख शरीर के भोग हैं। वे पूर्वकृत कर्मानुसार हर मनुष्य के जीवन में आते हैं। अतः सुधी जनों से दूसरों के प्रति सहृदयतापूर्वक व्यवहार अपेक्षित है। -चन्द्र प्रभा सूद

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