देवर्षि नारद ने अपना अंतिम निर्णय दे दिया-’निश्चय ही नामी से नाम श्रेष्ठ है’ और राजसभा के विसर्जन होने के पूर्व ही प्रत्यक्ष उदाहरण के द्वारा इसकी सत्यता प्रमाणित कर दी ।’
लंका-विजय के उपरांत अयोध्या में एक आर भगवान श्रीराम अपने राजदरबार में विराजमान थे। उस समय राजा श्रीराम को कुछ आवश्यक परामर्श देने के लिए देवर्षि नारद, विश्वामित्र , वशिष्ठ और अन्य अनेक ऋषिगण पधारे हुए थे और एक धार्मिक विषय पर विचार-चर्चा चल रही थी। देवर्षि नारद ने कहा-’सभी उपस्थित ऋषियों से एक प्रार्थना है। आप लोग अपने-अपने विचार से यह बतायें कि ’नाम’ (भगवान का नाम) और ’नामी’ (स्वयं भगवान) में कौन श्रेष्ठ है? इस विषय पर बड़ा वाद-विवाद हुआ किंतु राजसभा में उपस्थिति ऋषिगण किसी निर्णय पर नहीं पहुंच सके । अंत में देवर्षि नारद ने अपना अंतिम निर्णय दे दिया-’निश्चय ही नामी से नाम श्रेष्ठ है’ और राजसभा के विसर्जन होने के पूर्व ही प्रत्यक्ष उदाहरण के द्वारा इसकी सत्यता प्रमाणित कर दी ।’
नारद जी ने हनुमान जी को अपने पास बुलाया और कहा-’महावीर! जब तुम सामान्य रीति से सभी ऋषियों को और श्रीराम को प्रणाम करो, तब विश्वामित्र जी को प्रणाम मत करना... ।
नारद जी ने हनुमान जी को अपने पास बुलाया और कहा-’महावीर! जब तुम सामान्य रीति से सभी ऋषियों को और श्रीराम को प्रणाम करो, तब विश्वामित्र जी को प्रणाम मत करना । वे राजर्षि हैं, अतः वे समान व्यवहार और समान सम्मान के योग्य नहीं हैं।’ हनुमान जी सहमत हो गये। जब प्रणाम का समय आया, हनुमान जी ने सभी ऋषियों के सामने जाकर सबको दण्डवत् प्रणाम किया, केवल मुनि विश्वामित्र को नहीं किया। इससे मुनि विश्वामित्र जी का मन कुछ नाराज हो उठा। तब नारद जी विश्वामित्र मुनि के पास गये और बोले-’महाराज! हनुमान की दुष्टता तो देखो । भरी राजसभा में आपके अतिरिक्त उसने सभी को प्रणाम किया। उसे आप अवश्य दण्ड दें। आप ही देखिए, यह कितना उद्दण्डी और घमंडी है।’
विश्वामित्र राम के गुरु थे। अतः राजा राम को उनकी आज्ञा का पालन करना था। उसी समय भगवान बेजान-से हो गए, इसलिए कि उनको अपने हाथों अपने परम स्वामिभक्त सेवक को मृत्युदण्ड देना होगा।
बस इतने पर तो विश्वामित्र मुनि आगबबूला हो गए। वे राजा राम के पास गए और बोले-’राजन! तुम्हारे सेवक हनुमान ने इन सभी महान ऋषियों के बीच मेरा घोर अपमान किया है। अतः कल सूर्यास्त से पूर्व उसे तुम्हारे हाथों मृत्युदण्ड मिलना चाहिए।’ विश्वामित्र राम के गुरु थे। अतः राजा राम को उनकी आज्ञा का पालन करना था। उसी समय भगवान बेजान-से हो गए, इसलिए कि उनको अपने हाथों अपने परम स्वामिभक्त सेवक को मृत्युदण्ड देना होगा। ’श्रीराम के हाथों हनुमान को मृत्युदण्ड मिलेगा’ यह समाचार जंगल में आग की तरह सारे नगर में फैल गया।
नारद जी ने कहा-’हे हनुमान! आप निराश मत हो। जैसा मैं कहता हूं, वैसा करो।
हनुमान जी को भी बड़ा ही खेद हुआ। वे नारद जी के पास गये और बोले-’देवर्षि! मेरी रक्षा कीजिए। भगवान श्रीराम कल मेरा वध कर डालेंगे। मैंने आपके परामर्श के अनुसार ही कार्य किया। अब मुझे क्या करना चाहिए।’ नारद जी ने कहा-’हे हनुमान! आप निराश मत हो। जैसा मैं कहता हूं, वैसा करो। ब्रह्म मुहूर्त में बड़े सवेरे उठ जाओ। सरयू में स्नान करो। फिर सरिता के बालुका-तट पर खड़े हो जाओ और हाथ जोड़कर ’श्रीराम जय राम जय जय राम’-मंत्र का जप करो। मैं विश्वास दिलाता हूं कि तुमको कुछ नहीं होगा।’
भगवान श्रीराम हनुमान जी से बहुत दूर खड़े हो गए, अपने परम सेवक को करुणार्द्र दृष्टि से देखने लगे और अनिच्छापूर्वक हनुमान पर बाणों की वर्षा करने लगे परंतु उनका एक भी बाण हनुमान को बेध नहीं सका।
दूसरे दिन प्रभात हुआ। सूर्योदय के पहले ही हनुमान जी सरयु तट पर गये, स्नान किया और जिस प्रकार से देवर्षि नारद ने कहा था, तदनुसार हाथ जोड़कर भगवान के उपर्युक्त नाम का जप करने लगे। प्रातः काल हनुमान जी की कठिन परीक्षा देखने के लिए नागरिकों की भीड़ इकट्ठी हो गई। भगवान श्रीराम हनुमान जी से बहुत दूर खड़े हो गए, अपने परम सेवक को करुणार्द्र दृष्टि से देखने लगे और अनिच्छापूर्वक हनुमान पर बाणों की वर्षा करने लगे परंतु उनका एक भी बाण हनुमान को बेध नहीं सका। संपूर्ण दिवस बाण-वर्षा होते रहने पर भी हनुमान जी पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। भगवान ने ऐसे शस्त्रों का भी प्रयोग किया, जिनसे वे लंका की रणभूमि में कुंभकर्ण तथा अन्य भयंकर राक्षसों का वध कर चुके थे।
ऐसी स्थिति में नारद जी विश्वामित्र मुनि के पास गये और बोल-’हे मुनि! अब आप अपने क्रोध का संवरण करें। श्रीराम थक चुके हैं। विभिन्न प्रकार के बाण हनुमान का कुछ नहीं बिगाड़ सके।
अंत में भगवान श्रीराम ने अमोघ ’ ब्रह्मास्त्र’ उठाया। हनुमान जी भगवान के प्रति आत्म समर्पण किए हुए पूर्णभाव के साथ मंत्र का जोर-जोर से उच्चारण करके जप कर रहे थे। वे भगवान राम की ओर मुस्कुराते हुए देखते रहे और वे वैसे ही खड़े रहे। सब आश्चर्य में डूब गये और हनुमानजी की ’जय जय’ का घोष करने लगे। ऐसी स्थिति में नारद जी विश्वामित्र मुनि के पास गये और बोल-’हे मुनि! अब आप अपने क्रोध का संवरण करें। श्रीराम थक चुके हैं। विभिन्न प्रकार के बाण हनुमान का कुछ नहीं बिगाड़ सके। यदि हनुमान ने आपको प्रणाम नहीं किया तो इसमें है ही क्या? अब इस संघर्ष से श्रीराम को मुक्त कीजिए। अब आपने श्रीराम के नाम की महत्ता को समझ-देख ही लिया है। इन शब्दों से विश्वामित्र मुनि प्रभावित हो गए और ’ब्रह्मास्त्र द्वारा हनुमान को नहीं मारें’-ऐसा श्रीराम को आदेश दिया। हनुमान जी आये और अपने स्वामी श्रीराम के चरणों पर गिर पड़े एवं विश्वामित्र मुनि को भी उनकी दयालुता के लिए प्रणाम किया। विश्वामित्र मुनि ने बहुत प्रसन्न होकर हनुमान जी को आशीर्वाद दिया। उन्होंने श्रीराम के प्रति हनुमान की अनन्य भक्ति की बड़ी सराहना की।
विश्वामित्र मुनि ने बहुत प्रसन्न होकर हनुमान जी को आशीर्वाद दिया। उन्होंने श्रीराम के प्रति हनुमान की अनन्य भक्ति की बड़ी सराहना की।
जब हनुमान जी संकट में थे, तब प्रभु श्रीराम उनके सामने थे परंतु उनके आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम उनको मारने के लिए बेचैन थे । जो नाम का खजाना महान भक्त हनुमान जी के पास था, वह तो स्वयं श्रीराम के पास भी नहीं था। नाम रूपी कवच को बाण तो क्या, कोई भी दिव्य अस्त्र भेद नहीं सकता। प्रभु चाहते हुए भी हनुमान का कुछ भी बिगाड़ नहीं पाए क्योंकि उनके पास नाम का अपार खजाना था। इसलिए यह सिद्ध हो गया कि ’नाम’ (भगवान का नाम) ’नामी’ (स्वयं भगवान) से श्रेष्ठ है। गुरिन्द्र भरतगढ़िया(उर्वशी)