शारदीय नवरात्र आगमन के साथ ही वातावरण में भक्ति, उल्लास और उत्सव के रंग घुलने लगते हैं। मंदिरों में घंटियां गूंजती हैं, घरों में कलश स्थापित होते हैं, दुर्गा सप्तशती के पाठ शुरू होते हैं और देवी के जयकारों से दिशाएं मुखर हो उठती हैं। कहीं गरबा और डांडिया की थाप है, तो कहीं दुर्गा पूजा के भव्य पंडाल। नौ रातों तक चलने वाला यह उत्सव भारतीय संस्कृति की ऐसी परंपरा है, जिसमें धर्म, लोकजीवन, कला और सामूहिक चेतना एकाकार हो जाते हैं।
लेकिन नवरात्र का अर्थ केवल व्रत, उपवास, पूजा-पाठ और उत्सव की चहल-पहल तक सीमित नहीं हैं बल्कि देवी के नौ रूपों की आराधना का अर्थ यह भी हमारे समय, समाज और जीवन की समस्याओं से जुड़ता है । विचार करें तो नवरात्र केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नारी-शक्ति के आविर्भाव, अन्याय के प्रतिरोध और मनुष्य के भीतर सोई हुई ऊर्जा को जगाने का पर्व बनकर सामने आते हैं।
नवरात्र की पौराणिक पृष्ठभूमि में सबसे चर्चित महिषासुर के वध की कथा का प्रतीकात्मक अर्थ अत्यंत व्यापक है। जब स्थापित शक्तियां किसी संकट के सामने विवश हो जाती हैं, तब परिवर्तन की नई शक्ति जन्म लेती है। महिषासुर का अहंकार और अत्याचार जितना प्रबल था, देवी का संकल्प उससे कहीं अधिक दृढ़ था। यह आख्यान उस धारणा को चुनौती देता है कि शक्ति, पराक्रम और नेतृत्व केवल पुरुष के अधिकार क्षेत्र हैं। भारतीय धार्मिक कल्पना ने स्वयं उस स्त्री को सर्वोच्च शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया, जो संकट के समय व्यवस्था को बचाने के लिए आगे आती है।
महत्त्वपूर्ण बात है देवी का प्राकट्य देवताओं के सम्मिलित तेज से होता है। इसे सामाजिक संदर्भ में देखें तो संदेश मिलता है कि अन्याय से लड़ने के लिए सामूहिक चेतना, सहयोग और एकजुटता आवश्यक हैं। स्त्री की शक्ति का सम्मान केवल उसका व्यक्तिगत प्रश्न नहीं, पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
नवरात्र में पूजी जाने वाली नवदुर्गा के नौ रूप स्त्री-शक्ति के विविध आयामों को समझने का अवसर देते हैं। इन रूपों को केवल धार्मिक प्रतीकों की तरह देखने के बजाय जीवनमूल्यों के रूप में भी समझा जा सकता है। स्त्री में ममता है तो प्रतिरोध की क्षमता भी; सृजन है तो नेतृत्व भी; करुणा है तो अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी। उसे किसी एक भूमिका में बांध देना उसकी संपूर्णता को नकारना है।
नवरात्र की अष्टमी व नवमी को कन्या-पूजन की परंपरा इस पर्व को विशेष अर्थ देती है। छोटी बच्चियों को देवी का स्वरूप मानकर उनके पैर धोए जाते हैं, उन्हें भोजन कराया जाता है और उपहार दिए जाते हैं। यह परंपरा बालिका के प्रति आदर और पवित्रता की भावना का प्रतीक है। लेकिन यहीं एक असहज प्रश्न भी खड़ा होता है। जिस समाज में कन्या को देवी मानकर पूजने की परंपरा है, उसी समाज में बेटियों को जन्म से पहले समाप्त करने, उनकी शिक्षा रोकने, उनके साथ भेदभाव करने और उन्हें असुरक्षित रखने जैसी प्रवृत्तियां क्यों मौजूद हैं? जिस बच्ची के पैर नवरात्र में श्रद्धापूर्वक धोए जाते हैं, क्या उसके जीवन के बाकी दिनों में भी उसकी इच्छाओं, अधिकारों और आत्मसम्मान का उतना ही ध्यान रखा जाता है? कन्या-पूजन तभी सार्थक है, जब कन्या को दया की नहीं, समान अधिकारों की दृष्टि से देखा जाए। उसे अच्छी शिक्षा मिले, अपनी पसंद का जीवन चुनने की स्वतंत्रता मिले, संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिले और परिवार के निर्णयों में उसकी आवाज सुनी जाए। पूजा के कुछ घंटे और भेदभाव के शेष दिन, यह विरोधाभास नवरात्र की आत्मा के अनुकूल नहीं हो सकता।
आज स्त्री जीवन के लगभग हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा और क्षमता का परिचय दे रही है। वह विज्ञान, शिक्षा, प्रशासन, राजनीति, उद्यमिता, खेल और सेना में अपनी जगह बना रही है। परिवारों को आर्थिक और भावनात्मक आधार देने से लेकर कठिन परिस्थितियों में नेतृत्व करने तक, उसकी भूमिका लगातार विस्तृत हुई है। फिर भी सुरक्षा, समान अवसर, वेतन, घरेलू श्रम के बंटवारे और सामाजिक रूढ़ियों से जुड़े प्रश्न बने हुए हैं। ऐसे समय में नवरात्र का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। महिषासुर को भी आज के संदर्भ में केवल किसी पौराणिक दानव के रूप में देखना पर्याप्त नहीं। अहंकार, स्त्री-विरोध, हिंसा, शोषण, अज्ञान और भेदभाव जैसी प्रवृत्तियां आधुनिक समाज के वे महिषासुर हैं, जिनसे लड़ना आवश्यक है।
नवरात्र को आधुनिक संदर्भों से जोड़ने का अर्थ परंपराओं को त्यागना नहीं बल्कि उनके भीतर निहित मूल्यों को अधिक व्यापक बनाना है। पूजा-पाठ, व्रत, भजन और सांस्कृतिक आयोजन अपनी जगह महत्त्वपूर्ण हैं; उनके साथ कुछ ठोस सामाजिक पहल भी जुड़ें तो पर्व की गरिमा बढ़ती है।
मोहल्लों और पूजा समितियों में बेटियों की शिक्षा, महिला स्वास्थ्य, पोषण, डिजिटल साक्षरता और कानूनी अधिकारों पर संवाद आयोजित किए जा सकते हैं। जरूरतमंद छात्राओं की पढ़ाई के लिए सहयोग जुटाया जा सकता है। स्थानीय महिला उद्यमियों, शिल्पकारों और स्वयं सहायता समूहों को मेले तथा उत्सवों में स्थान देकर उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया जा सकता है।
गरबा, डांडिया, रामलीला और दुर्गा पूजा जैसे आयोजनों में महिलाओं की भागीदारी केवल मंच पर प्रस्तुति देने तक सीमित न रहे; आयोजन की योजना, वित्तीय प्रबंधन और नेतृत्व में भी उन्हें समान अवसर मिलें। सार्वजनिक स्थलों पर सुरक्षा, पर्याप्त प्रकाश, स्वच्छ शौचालय और आपात सहायता की व्यवस्था हो। उत्सव ऐसा हो जिसमें हर आयु की महिला निर्भय होकर शामिल हो सके।
उपवास करने या न करने का निर्णय व्यक्तिगत आस्था और स्वास्थ्य के अनुरूप होना चाहिए। किसी पर धार्मिक अनुष्ठानों का दबाव डालने के बजाय उनकी स्वतंत्रता का सम्मान करना भी आधुनिक सामाजिक विवेक का हिस्सा है। नव रात्र की प्रतिष्ठा तभी बढ़ेगी, जब आचरण बदलेगा
नवरात्र में भव्य पंडाल, महंगे शृंगार और आकर्षक रोशनी से आगे बढ़कर धार्मिक आयोजनों को सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ना होगा। प्रत्येक पूजा समिति यदि हर वर्ष किसी एक ठोस संकल्प को अपनाए-जैसे किसी बालिका की शिक्षा का खर्च उठाना, सार्वजनिक स्थल को महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाना या जरूरतमंद परिवारों की बेटियों को कौशल प्रशिक्षण देना,तो उत्सव की सकारात्मक शक्ति कई गुना बढ़ सकती है।
नवरात्र का मूल भाव शक्ति का जागरण है। यह जागरण मंदिरों में भी हो और मन में भी; आरती की लौ में भी दिखे और सामाजिक चेतना में भी। देवी की प्रतिमा के सामने सिर झुकाना आस्था है, लेकिन किसी स्त्री के आत्मसम्मान को ठेस न पहुंचाना उस आस्था की परीक्षा है।नौ रातों तक आदिशक्ति की आराधना करने वाला समाज यदि नौ दिनों के बाद फिर उसी भेदभाव, असुरक्षा और असमानता में लौट जाए तो उत्सव का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। (युवराज)
डॉ. घनश्याम बादल