नर्मदा  
धर्म/राशिफल

नर्मदा : जहाँ ज्ञान, वैराग्य और प्रेम एक साथ प्रवाहित होते हैं

नर्मदा के तट पर ज्ञान, वैराग्य और प्रेम का अद्भुत संगम मनुष्य की अंतःयात्रा को तप, भक्ति और मौन की अनुभूति से संसिद्धि की ओर ले जाता है

भारतीय संस्कृति में नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं हैं; वे सभ्यता की स्मृतियाँ, अध्यात्म की वाहिकाएँ और मनुष्य की अंतःयात्रा की सहचर हैं। इसलिए हमारे यहाँ किसी नदी का स्मरण केवल भूगोल का स्मरण नहीं होता, वह दर्शन का भी स्मरण होता है। गंगा, यमुना, सरस्वती और नर्मदा-इन सबकी अपनी-अपनी आध्यात्मिक पहचान है। इन्हीं में नर्मदा का स्थान अद्वितीय है, क्योंकि वह केवल एक नदी नहीं, तप की साक्षात् धारा है।

काशी को ज्ञानभूमि कहा गया है। वहाँ शिव का निवास है और आत्मबोध की ज्योति अनादि काल से प्रज्वलित है। काशी मनुष्य को यह सिखाती है कि अज्ञान के अंधकार को केवल ज्ञान ही दूर कर सकता है। वहाँ मृत्यु भी मोक्ष का उत्सव बन जाती है, क्योंकि ज्ञान भय का अंत कर देता है।

अयोध्या वैराग्यभूमि है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जीवन बताता है कि त्याग ही मनुष्य को ऊँचा बनाता है। राजसिंहासन से वनवास तक की यात्रा सत्ता की नहीं, आत्मसंयम की यात्रा है। वैराग्य संसार से भागना नहीं, बल्कि संसार के बीच रहते हुए भी उसके मोह से मुक्त होना है। अयोध्या इसी जीवन-दृष्टि का प्रतीक है।

ब्रज प्रेमभूमि है। वहाँ श्रीकृष्ण का माधुर्य है, राधा की अनन्यता है और गोपियों का निष्काम समर्पण है। ब्रज सिखाता है कि प्रेम ही वह शक्ति है जो ज्ञान को कठोर होने से बचाती है और वैराग्य को नीरस नहीं होने देती। प्रेम में अहं गलता है और ईश्वर निकट अनुभव होता है।

तपोसलिला

यदि काशी ज्ञान का, अयोध्या वैराग्य का और ब्रज प्रेम का प्रतीक हैं, तो नर्मदा का तट इन तीनों का अद्भुत संगम है। नर्मदा के किनारे अनगिनत ऋषियों ने तप किया, योगियों ने समाधि लगाई, संतों ने भक्ति का गायन किया और साधकों ने आत्मा की मौन आवाज़ सुनी। यहाँ ज्ञान भी है, वैराग्य भी है और भक्ति का मधुर रस भी। यही कारण है कि नर्मदा को केवल पुण्यसलिला नहीं, तपोसलिला भी कहा जाता है।

नर्मदा के तट पर खड़े होकर यह अनुभूति सहज ही होती है कि नदी केवल बाहर नहीं बह रही, भीतर भी बह रही है।

भारतीय दर्शन में मनुष्य का अंतिम लक्ष्य केवल विद्वान बनना नहीं है, केवल विरक्त होना भी नहीं है और केवल भावुक भक्त बन जाना भी पर्याप्त नहीं है। जब ज्ञान विवेक देता है, वैराग्य स्वतंत्रता देता है और भक्ति करुणा देती है, तब जीवन संसिद्धि की ओर बढ़ता है। यही संसिद्धि भारतीय चिंतन का चरम पुरुषार्थ है-वह अवस्था जहाँ मनुष्य अपने भीतर के सत्य से एकाकार हो जाता है।  नर्मदा के तट पर खड़े होकर यह अनुभूति सहज ही होती है कि नदी केवल बाहर नहीं बह रही, भीतर भी बह रही है। उसकी धारा मन के विकारों को धोती है, उसकी लहरें मौन का संगीत सुनाती हैं और उसका प्रवाह स्मरण कराता है कि जीवन का धर्म रुकना नहीं, निरंतर बहते रहना है। नर्मदा के दर्शन में प्रकृति और परमात्मा के बीच कोई दूरी नहीं रहती।

अनंत को सीमित में अनुभव करना ही साधना है। नर्मदा इसी सत्य की जीवंत व्याख्या है।

जब मैं अपनी अंजुलि में नर्मदा का जल उठाता हूँ, तब मुझे लगता है कि मैं संपूर्ण नर्मदा को नहीं, बल्कि अपनी पात्रता को भर रहा हूँ। नदी तो अनंत है; मेरी अंजुलि सीमित है। जितना जल उसमें समा पाता है, उतना ही मेरे लिए नर्मदा बन जाता है। उसी जल से मैं अपनी तृषा शांत करता हूँ, उसी से अपने भीतर उदित होते चेतना-सूर्य को अर्घ्य अर्पित करता हूँ। फिर जब रीती अंजुलि आँखों से लगाता हूँ, तब अनुभव होता है कि जल समाप्त हो गया, पर स्पर्श शेष है; अंजुलि रिक्त हो गई, पर हृदय भर गया।

 शायद अध्यात्म का सबसे बड़ा सत्य भी यही है कि ईश्वर को कोई पूर्णतः प्राप्त नहीं कर सकता; हर साधक उसे अपनी पात्रता के अनुसार ही ग्रहण करता है। अनंत को सीमित में अनुभव करना ही साधना है। नर्मदा इसी सत्य की जीवंत व्याख्या है। वह बाहर भी बहती हैं और भीतर भी; तटों के बीच भी और चेतना के अंतराल में भी।

 इसीलिए मेरे लिए नर्मदा केवल एक नदी नहीं, आत्मा का अखंड प्रवाह हैं। वे तप हैं, वे करुणा हैं, वे मौन हैं और वे उस सच्चिदानंद की अनुभूति हैं, जो शब्दों से नहीं, केवल अंतर्मन की निर्मल अंजुलि से प्राप्त होती है।

सुरेन्द्र दुबे (युवराज)

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