प्रतिक्रमण (आत्म-शुद्धि): महावीर स्वामी के अनुसार अपनी गलती स्वीकार करना और क्षमा माँगना ही सच्ची शिक्षा है। यदि हर क्षण संभव न हो, तो कम से कम 'संवत्सरी' (वर्ष में एक बार) प्रतिक्रमण अवश्य करना चाहिए। गलती करना उतना बड़ा पाप नहीं, जितना उसे स्वीकार न करना।
अहिंसा और संयम: 'अहिंसा परमो धर्म' का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा से बचना नहीं, बल्कि मन-वचन-काया से किसी को पीड़ा न देना है। जीवन में क्रोध, मोह और लोभ जैसे आंतरिक शत्रुओं (कषायों) को कम करना ही वास्तविक अहिंसा है।
ब्रह्मचर्य और सच्चा सुख: इंद्रिय सुख क्षणभंगुर हैं। वास्तविक और शाश्वत सुख केवल आत्मा में निहित है। व्यभिचार पतन का मार्ग है, जबकि ब्रह्मचर्य आत्म-शक्ति का स्रोत।
तप का स्वरूप: तपस्या अहंकार मिटाने के लिए होनी चाहिए, प्रदर्शन के लिए नहीं। यदि उपवास से गर्व बढ़ता है, तो वह व्यर्थ है। गुप्त दान और आडंबरहीन तप ही कर्मों का क्षय करते हैं।
जीवन की सार्थकता: यह मानव देह केवल मोक्ष प्राप्ति के लिए है। भोग-विलास और निरर्थक कार्यों में समय गँवाना आत्म-घात के समान है। जो व्यक्ति अपना समय आत्मा को समर्पित करता है, वही जीवन को सार्थक बनाता है।
निष्कर्ष: महावीर स्वामी दिखाए मार्ग पर चलकर ही हम इस दुर्लभ मानव जीवन को सफल बना सकते हैं।