शारदीय नवरात्र की सुबह मलूटी में जब पहली रोशनी उतरती है, तब सबसे पहले नजर उन प्राचीन मंदिरों पर नहीं जाती, जिनके कारण यह छोटा-सा गांव दूर-दूर तक पहचाना जाता है। मन ठहरता है मां मौलिक्षा के दरबार पर। धूप और दीप की गंध, पूजा की तैयारी, मंदिर की ओर बढ़ते श्रद्धालुओं के कदम और देवी के दर्शन की प्रतीक्षा-इन सबके बीच मलूटी जैसे अपनी सदियों पुरानी स्मृति को फिर से जीने लगता है। यहां नवरात्र केवल नौ दिनों का धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह मां मौलिक्षा की आराधना के बहाने उस इतिहास और लोकविश्वास के जागने का समय भी है, जिसने इस छोटे-से गांव को असाधारण बना दिया है।
दुमका जिले के शिकारीपाड़ा प्रखंड के पास बसा मलूटी बाहर से देखने पर एक सामान्य गांव लगता है, लेकिन मां मौलिक्षा के मंदिर की ओर बढ़ते ही उसका अर्थ बदलने लगता है। एक के बाद एक दिखाई देते प्राचीन मंदिर, पुरानी ईंटों की दीवारें और उनके बीच चलती पूजा की परंपरा यह बताती है कि यहां धर्म किसी एक मंदिर के गर्भगृह तक सीमित नहीं है। वह गांव के जीवन, उसकी स्मृति और उसकी पहचान में रचा-बसा है। यही कारण है कि मलूटी को केवल मंदिरों का गांव कहना उसके अर्थ को छोटा कर देना होगा।
मां मौलिक्षा इस पूरे सांस्कृतिक संसार की आध्यात्मिक धुरी हैं। गर्भगृह में ऊंचे चबूतरे पर प्रतिष्ठित देवी के मस्तक के दर्शन श्रद्धालु करते हैं। देवी की पूजा सिंहवाहिनी दुर्गा के रूप में की जाती है और स्थानीय आस्था में मां मौलिक्षा को जाग्रत शक्ति माना जाता है। नवरात्र के दिनों में इस आस्था का स्वर और गहरा हो जाता है। दूर-दराज से श्रद्धालु यहां आते हैं। कोई मन्नत लेकर आता है, कोई मन्नत पूरी होने पर, तो कोई केवल इसलिए कि उसके परिवार की आस्था पीढ़ियों से मां मौलिक्षा से जुड़ी रही है।
देवी के सामने मनुष्य की भाषा छोटी पड़ जाती है। वह अपने दुख, भय, उम्मीद और आकांक्षा को शब्दों से अधिक विश्वास में रखता है। मां मौलिक्षा के दरबार में नवरात्र के दिनों में यही विश्वास दिखाई देता है। शायद किसी जीवित देवी-परंपरा की सबसे बड़ी शक्ति यही होती है कि वह केवल अतीत में नहीं रहती। हर पीढ़ी उसे अपने वर्तमान में फिर से अर्थ देती है।
मां मौलिक्षा की पहचान से जुड़ा सबसे रोचक लोकविश्वास उन्हें पश्चिम बंगाल के तारापीठ की मां तारा से जोड़ता है। स्थानीय मान्यता है कि मां मौलिक्षा, मां तारा की बड़ी बहन हैं। इस संबंध को ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित तथ्य की तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा। यह लोकआस्था है। लेकिन ऐसी लोकआस्था को केवल इसलिए महत्वहीन नहीं माना जा सकता कि उसके समर्थन में इतिहास की किताबों में पर्याप्त दस्तावेज नहीं मिलते। लोकविश्वास भी किसी समाज की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा होते हैं। उन्होंने ही अक्सर उन भूगोलों को जोड़ा है जिन्हें राजनीतिक सीमाएं अलग-अलग दिखाती हैं।
एक ओर मां मौलिक्षा और दूसरी ओर मां तारा-दोनों के बीच संबंध की यह लोकस्मृति पीढ़ियों से चली आ रही है।
मलूटी और तारापीठ के बीच भी आस्था ने अपना एक ऐसा रास्ता बनाया है, जिसे नक्शे पर खींची रेखाओं से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। एक ओर मां मौलिक्षा और दूसरी ओर मां तारा-दोनों के बीच संबंध की यह लोकस्मृति पीढ़ियों से चली आ रही है। मां मौलिक्षा की पूजा शक्ति की उस व्यापक भारतीय परंपरा से भी जुड़ती है जिसमें देवी कभी दुर्गा हैं, कभी काली, कभी तारा और कभी किसी गांव की अपनी लोकदेवी। इसीलिए मलूटी की देवी को समझना केवल एक स्थानीय धार्मिक परंपरा को समझना नहीं है; यह उस भारतीय सांस्कृतिक चेतना को समझने की कोशिश भी है जिसमें अनेक रूपों में शक्ति की आराधना होती रही है।
तारापीठ के प्रसिद्ध साधक बामाखेपा के बारे में स्थानीय परंपरा में कहा जाता है कि तारापीठ जाने से पहले उन्होंने मलूटी में मां मौलिक्षा की आराधना की थी।
इस लोकस्मृति में बामाखेपा की कथा भी जुड़ती है। तारापीठ के प्रसिद्ध साधक बामाखेपा के बारे में स्थानीय परंपरा में कहा जाता है कि तारापीठ जाने से पहले उन्होंने मलूटी में मां मौलिक्षा की आराधना की थी। यहां उनके त्रिशूल की स्मृति का भी उल्लेख मिलता है। इन बातों को प्रमाणित इतिहास और लोकस्मृति के बीच स्पष्ट अंतर रखते हुए देखना चाहिए। लेकिन इन कथाओं की सांस्कृतिक शक्ति से इनकार नहीं किया जा सकता। लोककथा इतिहास की जगह नहीं लेती, लेकिन वह इतिहास के उन हिस्सों तक पहुंचने का रास्ता जरूर खोलती है जिन्हें दस्तावेज हमेशा दर्ज नहीं कर पाते।
पुराने समय में यहां 108 मंदिर होने की बात कही जाती है। आज लगभग 72 प्राचीन मंदिरों के बचे होने की पहचान मिलती है।
मलूटी की कहानी हालांकि केवल मां मौलिक्षा की आस्था तक सीमित नहीं है। इस गांव का पूरा स्थापत्य अपने भीतर एक लंबा सांस्कृतिक आख्यान समेटे हुए है। पुराने समय में यहां 108 मंदिर होने की बात कही जाती है। आज लगभग 72 प्राचीन मंदिरों के बचे होने की पहचान मिलती है। शिव, दुर्गा, काली, धर्मराज, मनसा, विष्णु और अन्य देवी-देवताओं को समर्पित ये मंदिर अलग-अलग समूहों में खड़े हैं। इसी असाधारण मंदिर-परंपरा के कारण मलूटी को ‘गुप्त काशी’ कहा जाता है। लेकिन इन मंदिरों की संख्या से अधिक महत्वपूर्ण उनकी उपस्थिति का सांस्कृतिक अर्थ है। मलूटी में शिव के अनेक मंदिर हैं, लेकिन मां मौलिक्षा का मंदिर धार्मिक चेतना का अपना विशिष्ट केंद्र है। यहां प्राचीन स्थापत्य और जीवित आस्था एक-दूसरे से अलग नहीं दिखते। पुराने मंदिर अतीत की गवाही देते हैं और मां मौलिक्षा की पूजा उस अतीत को वर्तमान में जीवित रखती है। नवरात्र में यह दृश्य और भी अर्थपूर्ण हो जाता है। सदियों पुरानी ईंटों के बीच नई पीढ़ी के श्रद्धालु सिर झुकाते हैं। मंदिर की पुरानी दीवारों पर दीपक की लौ पड़ती है। धूप की खुशबू हवा में घुलती है। आरती की आवाज उन मंदिरों के बीच फैलती है जो न जाने कितनी पीढ़ियों की आस्था के साक्षी रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे समय की दो धाराएं एक ही क्षण में मिल गई हों-एक अतीत की और दूसरी वर्तमान की।
इन मंदिरों की सबसे बड़ी विशेषताओं में टेराकोटा अलंकरण शामिल है। दीवारों पर उकेरी गई आकृतियों में देवी-देवताओं के साथ पशु-पक्षी, मिथकीय प्रसंग और सामाजिक जीवन के संकेत भी दिखाई देते हैं।
मलूटी की स्थापत्य परंपरा इस अनुभव को और गहरा करती है। यहां के मंदिरों पर बंगाल की स्थापत्य शैली का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। चाला शैली, पतली ईंट और चूना-सुर्खी से निर्मित मंदिरों की सादगी अपने भीतर एक अलग सौंदर्य रखती है, लेकिन इन मंदिरों की सबसे बड़ी विशेषताओं में टेराकोटा अलंकरण शामिल है। दीवारों पर उकेरी गई आकृतियों में देवी-देवताओं के साथ पशु-पक्षी, मिथकीय प्रसंग और सामाजिक जीवन के संकेत भी दिखाई देते हैं। इन टेराकोटा पट्टिकाओं को ध्यान से देखें तो मलूटी की दीवारें बोलती हुई लगती हैं। वे केवल धर्म की कथा नहीं कहतीं; वे अपने समय के समाज की झलक भी देती हैं। इस अर्थ में मलूटी के मंदिर केवल पूजा-स्थल नहीं, बल्कि दृश्य अभिलेख भी हैं। इतिहासकार इनमें अतीत के संकेत खोज सकता है, वास्तुकार स्थापत्य की भाषा पढ़ सकता है, कलाकार शिल्प की कल्पनाशीलता देख सकता है और गांव का कोई बुजुर्ग उनमें अपने पुरखों की स्मृति तलाश सकता है।
शायद यही मलूटी की सबसे बड़ी शक्ति है-यहां विरासत केवल विशेषज्ञों की विषय-वस्तु नहीं है। वह लोगों के जीवन का हिस्सा है। इसीलिए मलूटी के संरक्षण का प्रश्न केवल पुरानी इमारतों को बचाने का प्रश्न नहीं है। यदि मंदिरों की ईंटें बच गईं, लेकिन उनके भीतर की पूजा-परंपरा कमजोर पड़ गई, लोककथाएं भुला दी गईं और स्थानीय समाज अपनी ही विरासत से दूर हो गया, तो क्या मलूटी सचमुच बचा रहेगा ? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज किसी भी ऐतिहासिक स्थल को पर्यटन की दृष्टि से विकसित करना स्वाभाविक माना जाता है। पर्यटक आएं, श्रद्धालु आएं, स्थानीय लोगों को रोजगार मिले और गांव की अर्थव्यवस्था मजबूत हो-इसमें कोई विरोधाभास नहीं है लेकिन विकास और संरक्षण के बीच वह महीन रेखा पहचानना जरूरी है, जिसके पार जाकर विरासत केवल पर्यटन की वस्तु बन सकती है।
श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़े, लेकिन आधुनिक निर्माण प्राचीन स्थापत्य पर हावी न हो। पर्यटन बढ़े, लेकिन गांव की सांस्कृतिक पहचान उसके नीचे दब न जाए। लोकविश्वासों के संरक्षण का सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
मां मौलिक्षा का मंदिर पर्यटक के लिए देखने की चीज नहीं है। वह स्थानीय समाज के लिए जीवित आस्था का केंद्र है, इसलिए मंदिर परिसर के आसपास विकास जरूरी हो तो वह ऐसा हो जो विरासत की गरिमा के अनुरूप हो। श्रद्धालुओं की सुविधा बढ़े, लेकिन आधुनिक निर्माण प्राचीन स्थापत्य पर हावी न हो। पर्यटन बढ़े, लेकिन गांव की सांस्कृतिक पहचान उसके नीचे दब न जाए। लोकविश्वासों के संरक्षण का सवाल भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। मां मौलिक्षा को मां तारा की बड़ी बहन मानने की परंपरा हो या बामाखेपा से जुड़ी कथा-इनका मूल्य इस बात से तय नहीं होना चाहिए कि इन्हें ऐतिहासिक प्रमाण की कसौटी पर पूरी तरह सिद्ध किया जा सकता है या नहीं, लेकिन इन्हें इतिहास के रूप में प्रस्तुत करना भी उचित नहीं होगा। इनके लिए सही जगह लोकस्मृति की है। इन्हें उसी रूप में दर्ज करना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना अधिक विवेकपूर्ण रास्ता होगा।
मां मौलिक्षा के मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को केवल पूजा की जानकारी नहीं, मलूटी की सांस्कृतिक कहानी भी सुनाई जानी चाहिए। उन्हें बताया जाना चाहिए कि जिस देवी के सामने वे दीप जला रहे हैं, उनके चारों ओर सदियों पुरानी मंदिर-परंपरा सांस ले रही है।
शारदीय नवरात्र इस सांस्कृतिक स्मृति को जीवित रूप में सामने लाने का सबसे बड़ा अवसर है। मां मौलिक्षा के मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को केवल पूजा की जानकारी नहीं, मलूटी की सांस्कृतिक कहानी भी सुनाई जानी चाहिए। उन्हें बताया जाना चाहिए कि जिस देवी के सामने वे दीप जला रहे हैं, उनके चारों ओर सदियों पुरानी मंदिर-परंपरा सांस ले रही है। जिस दीवार को वे देख रहे हैं, उस पर बनी टेराकोटा आकृतियां अपने समय का जीवन दर्ज किए हुए हैं। और जिस मां को स्थानीय लोग तारा की बड़ी बहन मानते हैं, वह संबंध इतिहास से अधिक लोकविश्वास और सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है। तब तीर्थ केवल दर्शन का अनुभव नहीं रहेगा। वह स्मृति से मिलने का अनुभव भी बनेगा।
मलूटी की सबसे बड़ी शक्ति शायद यही है कि यहां अतीत मृत नहीं है। वह मां मौलिक्षा की पूजा में वर्तमान के साथ चलता है।
मलूटी की सबसे बड़ी शक्ति शायद यही है कि यहां अतीत मृत नहीं है। वह मां मौलिक्षा की पूजा में वर्तमान के साथ चलता है। नवरात्र में जब आरती की ध्वनि उठती है, तो उसके साथ केवल धार्मिक भाव नहीं उठता। उसमें पीढ़ियों की आस्था, गांव की स्मृति और उस सांस्कृतिक भूगोल की आवाज भी सुनाई देती है, जिसमें मलूटी और तारापीठ जैसे स्थान लोकविश्वास के अदृश्य सूत्रों से जुड़े हुए हैं। आज मलूटी में लगभग 72 प्राचीन मंदिर बचे हैं। कभी 108 मंदिर होने की बात कही जाती है। यह संख्या केवल क्षरण का हिसाब नहीं देती; यह एक चेतावनी भी देती है कि विरासत को समय पर नहीं बचाया गया तो स्मृति का कितना बड़ा हिस्सा हमेशा के लिए खो सकता है।
इस नवरात्र मां मौलिक्षा के दरबार में जलने वाला दीप इसलिए केवल देवी के चरणों में न जले। उसकी रोशनी उन पुरानी दीवारों तक भी पहुंचे, जिन पर इतिहास टेराकोटा में सांस ले रहा है। वह उन लोककथाओं तक भी पहुंचे, जिन्हें पीढ़ियां अपने साथ लेकर चली हैं
इस नवरात्र मां मौलिक्षा के दरबार में जलने वाला दीप इसलिए केवल देवी के चरणों में न जले। उसकी रोशनी उन पुरानी दीवारों तक भी पहुंचे, जिन पर इतिहास टेराकोटा में सांस ले रहा है। वह उन लोककथाओं तक भी पहुंचे, जिन्हें पीढ़ियां अपने साथ लेकर चली हैं और वह हमारे भीतर यह सवाल भी जगाए कि हम मां मौलिक्षा की इस जीवित परंपरा को आने वाली पीढ़ियों तक किस रूप में पहुंचाएंगे। मलूटी को बचाने का अर्थ केवल 72 मंदिरों को बचाना नहीं है। मां मौलिक्षा की पूजा, स्थानीय लोकविश्वास, नवरात्र की परंपरा, टेराकोटा की कला, स्थापत्य और गांव की सांस्कृतिक स्मृति-इन सबको साथ बचाना है, क्योंकि मंदिर टूट जाए तो उसका स्थापत्य किसी हद तक बचाया जा सकता है, लेकिन यदि आस्था और स्मृति टूट जाएं तो अंततः केवल ईंट और पत्थर बचेंगे।
शारदीय नवरात्र में मां मौलिक्षा के आंगन में यही सबसे बड़ा संदेश सुनाई देता है-विरासत वह नहीं जो केवल दीवारों में बची रहे, विरासत वह है जो पीढ़ियों के विश्वास में जीवित रहे। मां मौलिक्षा के आंगन में जागता मलूटी इसलिए केवल नवरात्र का उत्सव नहीं है। यह उस जीवित इतिहास का उत्सव है, जिसे एक गांव आज भी अपनी आस्था, स्मृति और परंपरा में संभाले हुए है। (युवराज) कुमार कृष्णन