प्रायः मनुष्य इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं होता कि उसे जो कुछ भी आज प्राप्त हो रहा है, वह उसके कर्मों का ही फल है। वह मानता है जो सुख वह भोग रहा है वह सब उसकी मेहनत का ही परिणाम है और यदि दुःख आता है तो वह उसे दूसरों का दिया मानता है। इसे अपने द्वारा उत्पन्न स्वार्थ पूर्ण कर्मों का फल नहीं मानता। वह सोचता है, यह सब भगवान द्वारा दिया जा है लेकिन क्यों दिया जा रहा है! इस पर कोई विचार नहीं करता।
वह दुःख के निवारण के लिए साधु-संतों के पास जाता है। मंदिरों में जाता है और उनके बताए अनुसार वह दान पुण्य के उपक्रम भी करता है। वे भी यह बात नहीं बताते कि आज जो दुःख है वह सदा नहीं रहेगा लेकिन जितने दिन दुःख है उसे तो भोगना ही पड़ेगा और यह सब उसके कर्मों का ही तो फल है। जब सारे सुख हमारे है, तो दुःख को भी अपनाना ही होगा।
कहीं वह स्वयं तो इसका जिम्मेदार नहीं !
मनुष्य सुख की स्थिति में अपने विषय भोगों में लिप्त रहता है। उस समय उसे सतकर्म या भगवान की याद ही नहीं आती और जब दुःख आता है तो उसके निवारण के लिए धैर्य धारण कर सतकर्मों की ओर नहीं बढ़ता। वह अनावश्यक रूप से अपना समय दूसरे प्रपंचों में गंवाता रहता है। खुद विचार नहीं करता कि इस दुःख के आने का क्या कारण हो सकता है ! कहीं वह स्वयं तो इसका जिम्मेदार नहीं !
भगवान कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य का जीवन उसके कर्म के धागों के अनुसार ही चलता है। जैसे कर्म होते है उसी प्रकार का परिणाम भी निर्धारित होता जाता है। इसमें किसी दूसरे का कोई योगदान नहीं होता।
खैर, भगवान कहते हैं कि प्रत्येक मनुष्य का जीवन उसके कर्म के धागों के अनुसार ही चलता है। जैसे कर्म होते है उसी प्रकार का परिणाम भी निर्धारित होता जाता है। इसमें किसी दूसरे का कोई योगदान नहीं होता। हां, इस संसार में मनुष्य की रीति ही यह है कि वह दुःख में, किसी प्रकार की कठिनाई में, अपनी गलतियां नहीं देख कर दूसरों को दोषी ठहराने की कोशिश करता है। जबकि होना यह चाहिए कि किसी दूसरे को दोषी ठहराने के बजाय वह अपने कार्य व्यवहार, बोलचाल में यह प्रयास करे कि, किसी अन्य को कोई दुःख तकलीफ या परेशानी तो नहीं हो रही है। उसे जो कुछ मिल रहा है उसे सहज भाव से स्वीकार करे और धैर्य रखे।
’’जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है’’ में विश्वास नहीं
मनुष्य की एक वृति और होती है, वह हमेशा अधिक पाने की लालसा को पाले रखता है जबकि प्रकृति के अनुसार उसको कब कितना मिलना है सब कुछ पहले से निर्धारित कर रखा है। ऐसे में यदि वह भगवान पर विश्वास कर जो है, उसका सदुपयोग करता है तो, समय अनुसार उसकी सभी प्रकार की इच्छाएं पूर्ण होती जाती हैं। ऐसा हमारे शास्त्र और संतजन भी कहते आये हैं लेकिन मनुष्य ’’जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है’’ में विश्वास नहीं कर उचित अनुचित तरीके से अधिक से अधिक इकट्ठा करने के उपक्रम में लगा रहता है।
श्रेष्ठ जन ने कहा है कि किसी भी प्रकार की सफलता के लिए एक सीमा निर्धारित है। उसके बाद चढ़ना नहीं, गिरना ही होता है।
ऐसे में वह कुछ समय के लिए सफल भी होता है। प्रकृति भी उसका साथ देती है, लेकिन एक समय तक, उसके बाद वह देने के रास्ते बंद करती है क्योंकि वह समय से पहले और अनधिकृत रूप से चाहता है। फिर, जब मनुष्य को पहले की तरह नहीं मिलता तो, वह उसे जारी रखने के प्रयास में गलत कदम भी उठाता है। यहीं से उसके दुःख का काल शुरू हो जाता है। श्रेष्ठ जन ने कहा है कि किसी भी प्रकार की सफलता के लिए एक सीमा निर्धारित है। उसके बाद चढ़ना नहीं, गिरना ही होता है। यह गिरना, जो मिला है उससे अधिक पाने की लालसा में होता है। ऐसे कई लोगों को देखा है जो चढे़ तो खूब चढे़ लेकिन जब गिरना शुरू हुआ तो वे अपने आप को सम्भाल ही नहीं पाए।
कर्म सब लौटाता है
पानी जब तक किनारों के मध्य रहता है। वह सुरक्षित अपनी मंजिल पर पहुंचता है लेकिन जब वह किनारों को तोड़ कर स्वच्छंद तरीके से आगे बढ़ने की सोचता है, उसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। न मंजिल मिलती है और न ही अपना वजूद रह पाता है। यही स्थिति मनुष्य की है। जब तक वह अपने दायरे में रह कर सीढ़ियां चढ़ता है, सफल भी होता है लेकिन जब किसी का हक मारकर या किसी को परेशान कर सफलता चाहता है तो उसके अनुसार परिणाम भी आते है। ऐसा कहा जाता है कि कर्म सब लौटाता है।
हर दिया गया दर्द लौटकर आता है
जिस इंसान ने दूसरों के साथ छल किया, अपमान किया है और वह समझता है कि उसका कोई हिसाब नहीं होगा, वह सबसे बड़ा भ्रम पाल रहा है। कर्म कभी चुप नहीं रहता। आज तुम किसी का दिल दुखाकर हंस रहे हो, कल वही दर्द तुम्हारी जिंदगी को चीर देगा। समय सब देखता है, और कर्म उसी समय पर वार करता है जब इंसान सबसे ज्यादा घमंड में होता है। जो आंसू तुमने किसी की आंखों में दिए हैं, वही एक दिन तुम्हारी रातों की नींद छीन लेंगे। कर्म की मार आवाज नहीं करती लेकिन इंसान को अंदर से तोड़ देती है। इसलिए दूसरों को दर्द देने से पहले याद रखो - हर दिया गया दर्द लौटकर आता है।
समभाव मन को शांत रखता है
भगवान कृष्ण कहते हैं कि सुख-दुख, लाभ-हानि और जीत-हार को समान समझो। जीवन में अच्छे और बुरे समय दोनों आते-जाते रहते हैं। जो व्यक्ति इनमें समान भाव रखता है, वह कभी टूटता नहीं। समभाव मन को शांत रखता है और सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाता है। कठिन समय में हम अक्सर भविष्य की चिंता में डूब जाते हैं, जिससे वर्तमान बिगड़ जाता है। गीता सिखाती है कि फल की चिंता छोड़कर पूरे समर्पण से अपना कर्तव्य निभाएं। जब हम बिना उम्मीद के कर्म करते हैं, तो मन का बोझ कम हो जाता है और रास्ता खुद-ब-खुद साफ होता जाता है। -रामस्वरूप रावतसरे(युवराज)