समय के साथ तू भी,
अपनी परिभाषा बदलता जा।
अपनों के संग पल बिताता जा,
खुद को भी आनंदित करता जा।
औरों के सुख-दुख सुनता जा,
हो सके तो हाथ बँटाता जा।
कुछ अपनी कह, कुछ उनकी सुन,
प्रेम की धारा बहाता जा,
लोगों को वक्त का उपहार देता जा।
उम्र के हर पड़ाव पर,
अहंकार की बातें भुलाता जा।
औरों के दुख को सुख में बदलने का,
सच्चा प्रयास कर जा।
यही तो जीवन का सच्चा आनंद है!
यहाँ अपना क्या है ?
जो है, उसी ईश्वर का दिया हुआ है,
उसके बनाए संसार को लौटाता जा।
सहेज कर भी क्या पाएगा,
जाना तो एक दिन खाली हाथ है।
किसी जरूरतमंद का हाथ थाम कर तो जा,
तू अधरों पर मुस्कान लिए चलता जा।
दिखावा करने की ज़रूरत नहीं,
उसने भी कब जता कर दिया है!
बिना कहे, बिना बताए,
अपनी आत्मा को उल्लास दे जा।
लोग याद रखें या भूल जाएँ,
इस बात की तनिक भी चिंता न कर,
बस राह में चलते-चलते,
सब पर अपना प्यार लुटाता जा।
- डॉ. सुशील कुमार पांडेय "अतीत"