पूर्वी राजस्थान के धौलपुर और करौली जिलों में डकैतों की शरणस्थली के रूप में देश और दुनिया में चर्चित चंबल के बीहड़ में अब बाघ के नन्हे "शावक" की किलकारी गूंज रही है। चंबल के बीहड़ में स्थित धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व में एक बाघिन ने एक नन्हे शावक को जन्म दिया है। इसके बाद धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या बढ़कर अब दस हो गई है। देश एवं प्रदेश के वन एवं पर्यावरण प्रेमियों के लिए एक सुखद खबर है। धौलपुर–करौली टाइगर रिज़र्व में बाघिन टी-117 ने एक शावक को जन्म दिया है। राजस्थान के वन एवं पर्यावरण मंत्री संजय शर्मा ने भी अपने सोशल मीडिया हैंडल पर इस तस्वीर को साझा किया है। धौलपुर करौली-टाइगर रिजर्व में टाइगर का कुनबा बढ़ने के बाद अब पर्यटकों को इस रिजर्व क्षेत्र में अधिक टाइगर देखने को मिलेंगे। वहीं, यह रिज़र्व क्षेत्र में बाघों के सफल संरक्षण और अनुकूल आवास का सकारात्मक संकेत भी है।
बीते दिनों बाघिन टी-117 व उसके एक शावक धौलपुर- करौली टाइगर रिज़र्व के जंगलों में देखे गए हैं। मकर संक्रांति के दिन रिज़र्व क्षेत्र की बाघिन टी-117 ने एक शावक को जन्म दिया है। विभाग के कैमरे में बाघिन टी-117 अपने नवजात शावक के साथ जंगल में विचरण करती हुई देखी गई है। जंगल में बाघिन बादली टी-117 के साथ शावक देखे जाने के बाद मूवमेंट स्थल पर कड़ी निगरानी बढ़ाकर वनकर्मियों की टीम तैनात कर दी गई हैं। डीएफओ डॉ. आशीष व्यास ने बताया कि वर्ष 2023 में धौलपुर जिले के सरमथुरा उपखंड क्षेत्र के झिरी फारेस्ट ऐरिया में बीते दिनों बाघिन टी 117 के द्वारा तीन शावकों को जन्म दिया था। इससे दो वर्ष पहले वर्ष 2021 में बाघिन टी-117 ने दो शावकों को जन्म दिया था। इस प्रकार यह बाघिन धौलपुर–करौली टाइगर रिज़र्व में बाघों के कुनबे को बढ़ा चुकी है जिससे आने वाले समय में टाइगर रिजर्व में पर्यटन को पंख लगेंगे।
वर्तमान में इसके दो शावक, जिनकी पहचान डीकेटी-2501 एवं डीकेटी-2502 के रूप में की गई है। इस नए शावक के आने के साथ ही धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व क्षेत्र में टाइगरों की कुल संख्या बढ़कर दस हो गई है जिनमें तीन शावक शामिल हैं। डॉ. आशीष व्यास ने बताया बाघ रिज़र्व क्षेत्र में सुरक्षित रूप से विचरण कर रहे हैं। यह उपलब्धि धौलपुर–करौली टाइगर रिज़र्व में अनुकूल प्राकृतिक आवास, सुदृढ़ सुरक्षा व्यवस्था, सतत निगरानी, कैमरा ट्रैप मॉनिटरिंग तथा फील्ड स्टाफ के समर्पित प्रयासों का प्रतिफल है। बाघों की निरंतर प्रजनन सफलता यह दर्शाती है कि रिज़र्व क्षेत्र वन्यजीव संरक्षण के लिए सुरक्षित एवं अनुकूल बनता जा रहा है। वन विभाग द्वारा बाघिन एवं उसके शावकों की गतिविधियों पर सतत निगरानी रखी जा रही है तथा क्षेत्र में सुरक्षा एवं संरक्षण व्यवस्था को और अधिक मजबूत किया गया है।
इससे वन्यजीवों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराया जा सकेगा । धौलपुर–करौली टाइगर रिज़र्व में बाघों के कुनबे में हो रही यह वृद्धि न केवल राजस्थान बल्कि सम्पूर्ण देश में बाघ संरक्षण प्रयासों के लिए एक सकारात्मक संकेत है। राजस्थान के सवाई माधोपुर में बने रणथंभौर अभयारण्य में बाघों की संख्या में बढ़ोतरी होने के बाद में राजस्थान के ही धौलपुर जिले के सरमथुरा और करौली को जोड़कर नया टाइगर रिजर्व बना है। धौलपुर-करोली के रूप में नए टाइगर रिजर्व के बनने से बाघों की मूवमेंट के लिए धौलपुर सरमथुरा-करौली क्षेत्र में नया टाइगर रिजर्व का एरिया मिल गया है। धौलपुर सरमथुरा-करौली टाइगर रिजर्व का कुल एरिया 1058 वर्ग किमी है। इसमें 368 वर्ग किलोमीटर का कोर एरिया और 690 वर्ग किलोमीटर का बफर जोन है। धौलपुर करौली टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या बढ़ने के बाद आने वाले दिनों में यहां पर्यटन संख्या बढ़ाने की पूरी उम्मीद है।
धौलपुर-करौली टाइगर रिज़र्व धौलपुर और करौली के वन क्षेत्रों को कवर करता है, जिसमें पूर्व में डांग क्षेत्र, धौलपुर वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी और करौली वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी शामिल हैं। यह बाघों की आबादी बढ़ाने और सुरक्षित कॉरिडोर प्रदान करने के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र भी है जो सीधे रणथंभौर से जुड़ा है। यह क्षेत्र अपने चट्टानी परिदृश्य, डांग क्षेत्र की पहाड़ियों और घने जंगलों के लिए जाना जाता है जिससे बाघों को उनकी पसंद का आवासीय एवं मूवमेंट का क्षेत्र मिल रहा है। इस क्षेत्र के पास चंबल नदी के किनारे डांग क्षेत्र और घड़ियाल अभयारण्य भी हैं, जहां सर्दियों में देशी एवं विदेशी पक्षियों की मौजूदगी पर्यटकों को सुखद अहसास कराती है और जो इसे जैव विविधता से समृद्ध भी बनाते हैं। यही वजह है कि धौलपुर-करौली टाइगर रिज़र्व राजस्थान के साथ-साथ देश और दुनिया के लिए एक नया टूरिज्म डेस्टिनेशन बन रहा है।
बताते चलें कि राष्ट्रीय बाघ सरंक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) ने 22 अगस्त 2023 को राजस्थान के करौली और धौलपुर जिलों में बाघ अभयारण्य बनाने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी, जिसके बाद धौलपुर - करौली बाघ अभयारण्य बाघों को समर्पित देश का 54वां अभयारण्य बन गया है। राजस्थान में रणथम्भौर, सरिस्का, मुकुंद्रा हिल्स और रामगढ़ विषधारी के बाद यह पांचवां बाघ अभयारण्य है। प्रोज़ेक्ट टाइगर की शुरुआत केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा वर्ष 1973 में की गई थी। देश के प्रसिद्ध जीव विज्ञानी कैलाश सांखला को इस कार्यक्रम का पहला निदेशक नियुक्त किया गया था। इस कार्यक्रम के तहत बाघ आबादी वाले राज्यों को बाघों के संरक्षण हेतु केंद्रीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है। वर्ष 1973 में प्रोज़ेक्ट टाइगर की शुरुआत के समय देश में मात्र 9 टाइगर रिज़र्व थे, वर्तमान में देश में कुल टाइगर रिज़र्वों की संख्या बढ़कर 54 हो गई है।
प्रदीप कुमार वर्मा (युवराज)