समानता और शिक्षा की क्रांतिकारी मशाल : सावित्रीबाई फुले सांकेतिक चित्र इंटरनेट से साभार
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समानता और शिक्षा की क्रांतिकारी मशाल : सावित्रीबाई फुले

10 मार्च सावित्रीबाई फुले महापरिनिर्वाण दिवस

भारतीय समाज में जब भी शिक्षा, समानता और सामाजिक न्याय की बात उठती है तो एक नाम इतिहास के पन्नों से निकलकर हमारे सामने खड़ा हो जाता है— सावित्रीबाई फुले। 10 मार्च को उनका महापरिनिर्वाण दिवस केवल श्रद्धांजलि देने का दिन नहीं है, बल्कि यह दिन उस सामाजिक चेतना को याद करने का अवसर है, जिसने सदियों से जकड़े भारतीय समाज को झकझोरने का साहस किया।

19वीं सदी का भारतीय समाज गहरे अंधविश्वास, जातिगत ऊंच-नीच और महिलाओं के प्रति भेदभाव से ग्रस्त था। महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा जाता था और समाज ने उनके लिए घर की चारदीवारी से बाहर निकलने के रास्ते लगभग बंद कर दिए थे। ऐसे दौर में सावित्रीबाई फुले ने अपने जीवन को सामाजिक परिवर्तन के संघर्ष में झोंक दिया। उनके साथ इस अभियान में कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे महान समाज सुधारक ज्योतिबा फुले।

सावित्रीबाई फुले को भारत की पहली महिला शिक्षिका होने का गौरव प्राप्त है। वर्ष 1848 में उन्होंने पुणे में लड़कियों के लिए पहला विद्यालय शुरू किया। यह केवल एक स्कूल की शुरुआत नहीं थी, बल्कि उस मानसिकता के खिलाफ खुला विद्रोह था, जो मानती थी कि महिलाओं के लिए शिक्षा अनावश्यक है। जब सावित्रीबाई पढ़ाने के लिए घर से निकलती थीं, तो रास्ते में कट्टरपंथी लोग उन पर पत्थर, कीचड़ और गोबर तक फेंकते थे लेकिन वे न तो डरीं और न ही रुकीं। वे अतिरिक्त साड़ी साथ लेकर निकलती थीं, ताकि स्कूल पहुंचकर बदल सकें और बच्चियों को पढ़ाने का अपना संकल्प पूरा कर सकें। यह केवल साहस नहीं, बल्कि सामाजिक क्रांति का बीज था।

 सावित्रीबाई फुले का स्पष्ट विश्वास था कि शिक्षा ही वह हथियार है, जो समाज में फैले अज्ञान, भेदभाव और अन्याय को समाप्त कर सकता है। उन्होंने लड़कियों के साथ-साथ दलितों और वंचित वर्गों को भी शिक्षा से जोड़ने का अभियान चलाया। उस समय जब जातिगत भेदभाव समाज की गहरी जड़ों में समाया हुआ था, तब उन्होंने शिक्षा को समानता का माध्यम बनाया और समाज के सबसे वंचित वर्गों के लिए भी ज्ञान के द्वार खोलने का प्रयास किया।

सावित्रीबाई फुले का संघर्ष केवल शिक्षा तक सीमित नहीं था। उन्होंने बाल विवाह, विधवाओं के शोषण और महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों के खिलाफ भी मुखर आवाज उठाई। उन्होंने विधवाओं के लिए आश्रय गृह शुरू किए और अनचाहे गर्भ से जन्म लेने वाले बच्चों की सुरक्षा के लिए भी व्यवस्था की। उस दौर में यह पहल केवल सामाजिक सुधार नहीं थी बल्कि मानवता के पक्ष में खड़ा होने का साहसिक निर्णय था।

वे एक संवेदनशील कवयित्री और लेखिका भी थीं। उनकी रचनाओं में शिक्षा, आत्मसम्मान और सामाजिक बराबरी की स्पष्ट पुकार सुनाई देती है। उनके शब्द केवल साहित्य नहीं थे बल्कि समाज को जगाने वाली चेतावनी थे।

 साल 1897 में पुणे में प्लेग की भयानक महामारी फैली। जब लोग संक्रमितों से दूरी बना रहे थे, तब सावित्रीबाई फुले बीमारों की सेवा में दिन-रात लगी रहीं। वे पीड़ितों को अपने कंधों पर उठाकर अस्पताल तक पहुंचाती थीं। इसी सेवा के दौरान वे स्वयं भी प्लेग की चपेट में आ गईं और 10 मार्च 1897 को उनका महापरिनिर्वाण हो गया। उनका जीवन और उनका बलिदान मानवता की सेवा का अद्वितीय उदाहरण है।

आज जब हम सावित्रीबाई फुले को याद करते हैं, तो यह सवाल भी हमारे सामने खड़ा होता है कि क्या हम उनके सपनों का समाज बना पाए हैं? आज भी महिलाओं की शिक्षा, सम्मान और सुरक्षा के सवाल पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। सामाजिक असमानताएं आज भी कई रूपों में हमारे सामने मौजूद हैं।

    ऐसे समय में सावित्रीबाई फुले का जीवन हमें यह याद दिलाता है कि बदलाव केवल नारों से नहीं आता बल्कि साहस, संघर्ष और प्रतिबद्धता से आता है। उन्होंने जो मशाल जलायी थी, वह केवल इतिहास की धरोहर नहीं है, बल्कि आज भी सामाजिक परिवर्तन की राह को रोशन करने वाली लौ है।

 महापरिनिर्वाण दिवस पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम शिक्षा को समानता का माध्यम बनाएं और समाज के हर वर्ग तक अवसर और सम्मान पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध हों क्योंकि सावित्रीबाई फुले ने जो लड़ाई शुरू की थी, वह आज भी अधूरी है—और उसे आगे बढ़ाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।  बाबूलाल नागा( अदिति फीचर्स )

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