मध्य प्रदेश के सरकारी अभिलेखागार की धूल भरी फाइलों के ढेर में से एक ऐसी चिट्ठी निकली है, जिसने इतिहासकारों को भी चौंका दिया है। ज्ञान भारत मिशन के तहत चल रहे डिजिटलीकरण के दौरान तात्या टोपे की अपने हाथों से लिखी एक दुर्लभ चिट्ठी मिली है। इस पर उनके असली हस्ताक्षर मौजूद हैं। यह चिट्ठी उस दौर की कूटनीति और योजना की कहानी बयां कर रही है।
क्या लिखा है चिट्ठी में?
'चैत्र बदी 7, संवत 1914' (सन् 1857) की तारीख वाली यह चिट्ठी मराठमोली लिपि में लिखी गई है। इसे डिकोड करने के लिए भाषाई विशेषज्ञों की मदद ली गई। पत्र में तात्या टोपे ने सूबेदारों, सरदारों और सिपाहियों को संबोधित करते हुए एकजुट होने का आह्वान किया है।
चिट्ठी का मुख्य अंश इस तरह है
'तात्या साहेब बहादुर के आदेशानुसार... सभी सिपाहियों और सरदारों को इकट्ठा होकर विचार-विमर्श करना चाहिए। जो भी सबकी आपसी सहमति से तय होगा, वह हमें स्वीकार्य होगा।'
गहरी रणनीति
यह चिट्ठी साबित करती है कि 1857 का गदर कोई अचानक भड़का गुस्सा नहीं था, बल्कि इसके पीछे गहरी रणनीति थी। तात्या टोपे ने ग्वालियर, झांसी, शिवपुरी और बैतूल जैसे इलाकों में घूम-घूम कर राजाओं और सिपाहियों को एकजुट किया था। पत्र में चरखारी के राजा के एक प्रस्ताव का भी जिक्र है।