Ram Avatar Gupta JI Sanmarg
महान् विभूतियाँ

राम अवतार गुप्त : संकल्प का एक बीज जो विशाल वटवृक्ष बन गया

101वीं जयंती (12 जून)

इतिहास गवाह है कि यह नश्वर शरीर एक दिन मिट्टी में मिल जाता है, लेकिन एक अडिग संकल्प कालजयी होता है। जब कोई संकल्पवान व्यक्ति इस संसार से विदा लेता है, तो वह अपने पीछे केवल स्मृतियाँ नहीं, बल्कि एक जीवंत ऊर्जा छोड़ जाता है जिसे हम 'संकल्पशक्ति' कहते हैं। पूर्वी भारत में हिन्दी पत्रकारिता के शिखर पुरुष और दैनिक 'सन्मार्ग' के संस्थापक श्री राम अवतार गुप्त का जीवन और उनकी विरासत इसी शाश्वत सत्य का साक्षात प्रमाण हैं।

संघर्षों की भूमि पर संकल्प का बीजारोपण

किसी भी महान परिवर्तन की शुरुआत एक व्यक्ति के मस्तिष्क में उपजे एक छोटे से विचार से होती है, जो आगे चलकर संकल्प का रूप ले लेता है। आषाढ़ कृष्ण 6, सम्वत् 1982 (12 जून, 1925) को जयपुर के प्रागपुरा गांव के एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे श्री राम अवतार गुप्त का शुरुआती जीवन कड़े संघर्षों के बीच बीता। पढ़ाई-लिखाई की राह में मुश्किलों के पहाड़ खड़े थे, लेकिन बाधाएं उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति के आगे नतमस्तक हो गईं। दसवीं तक की औपचारिक शिक्षा के बाद स्वाध्याय (Self-study) उनका स्वभाव बन गया। इसी स्वाध्याय की बदौलत उन्होंने सनातन धर्मग्रंथों, साहित्यिक कृतियों और पत्रकारिता की बारीकियों को आत्मसात किया। यह उनकी इच्छाशक्ति का ही परिणाम था जिसने एक सामान्य बालक को असाधारण पथ का राही बना दिया।

महान संकल्पवान व्यक्ति कभी भी यथास्थितिवादी नहीं होते। बंद मुट्ठी में मुकद्दर न ढूंढने वाले गुप्त जी कुछ बड़ा करना चाहते थे-अपने समाज और राष्ट्र के लिए।

यथास्थिति (Status quo) से विद्रोह और काशी की पाठशाला

महान संकल्पवान व्यक्ति कभी भी यथास्थितिवादी नहीं होते। बंद मुट्ठी में मुकद्दर न ढूंढने वाले गुप्त जी कुछ बड़ा करना चाहते थे-अपने समाज और राष्ट्र के लिए। कलकत्ता प्रवास के दौरान एक सामान्य नौकरी में उनका मन नहीं रमा, क्योंकि नियति ने उनके लिए एक व्यापक कैनवास तय कर रखा था। वर्ष 1946 में दैवयोग से वे वाराणसी के 'सन्मार्ग' समाचार पत्र से जुड़े। परम श्रद्धेय स्वामी करपात्री जी महाराज के आशीर्वाद और तत्कालीन पत्रकारिता के दिग्गजों के मार्गदर्शन में काशी नगरी उनकी पहली व्यावहारिक पाठशाला बनी। अपने कुशल प्रबंधन और कर्तव्यनिष्ठा से उन्होंने सन्मार्ग को उत्तर भारत में एक लोकप्रिय नाम बना दिया।

उनके अथक परिश्रम का ही परिणाम है कि सन्मार्ग देखते ही देखते भारत के सबसे प्रतिष्ठित और पूर्वी भारत के 'नंबर वन' हिन्दी दैनिक के रूप में स्थापित हो गया।

दूरदर्शिता का सुफल : पूर्वी भारत में हिन्दी का परचम

वर्ष 1946 में ही स्वामी करपात्री जी के शुभाशीष से 'सन्मार्ग' का प्रकाशन कलकत्ता (अब कोलकाता) से आरंभ हुआ। यह वह दौर था जब अंग्रेजी अखबारों का दबदबा और प्रभुत्व था। ऐसे समय में गुप्त जी की दूरदर्शिता ने हिन्दी के महत्व और प्रभाव को प्रमाणित किया। उनके अथक परिश्रम का ही परिणाम है कि सन्मार्ग देखते ही देखते भारत के सबसे प्रतिष्ठित और पूर्वी भारत के 'नंबर वन' हिन्दी दैनिक के रूप में स्थापित हो गया। उन्होंने पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं, बल्कि सत्य, निष्पक्षता और न्याय का माध्यम बनाया। वे बंगाल के आम जन और विशेषकर हिन्दी भाषी समाज की बुलंद आवाज बने। यह अतिशयोक्ति नहीं कि आज लाखों हिन्दी पाठकों की सुबह सन्मार्ग के पठन से ही होती है।

हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ अंक लाने वाले छात्र-छात्राओं और शिक्षकों को सम्मानित करने की जो अनूठी परंपरा शुरू की थी, वह आज भी 'राम अवतार गुप्त शिक्षा संकल्प' के रूप में जीवित है

'हिन्दी शिक्षा सम्मान' और समृद्ध सामाजिक विरासत

सांसारिक संपत्ति और भौतिक चीजें समय के साथ नष्ट हो जाती हैं, लेकिन समाज को दी गई वैचारिक विरासत अमर रहती है। गुप्त जी का मानना था कि जिस समाज ने हमें इतना कुछ दिया, उसके प्रति हमारा भी एक दायित्व है। उनका हिन्दी प्रेम सर्वविदित था। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने परीक्षा में सर्वश्रेष्ठ अंक लाने वाले छात्र-छात्राओं और शिक्षकों को सम्मानित करने की जो अनूठी परंपरा शुरू की थी, वह आज भी 'राम अवतार गुप्त शिक्षा संकल्प' के रूप में जीवित है और इस वर्ष अपने 20 वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है। भौतिक शरीर में न होकर भी वे इस सम्मान के माध्यम से हर साल लाखों युवाओं को हिन्दी अपनाने और आगे बढ़ने की प्रेरणा दे रहे हैं।

कृतित्व को मान्यता : सम्मान और पुरस्कार

सत्य के पथ पर चलने वाले पथिक को समाज और राष्ट्र का आदर स्वतः प्राप्त होता है। पत्रकारिता और राष्ट्रीय एकता में उनके अनुपम योगदान के लिए उन्हें 1988 में अखिल भारतीय 'मातृ श्री सम्मान' से विभूषित किया गया। इसके बाद 1996 में 'पंडित जवाहर लाल नेहरू पुरस्कार', 1998 में 'बिहार चेतना दिवस सम्मान' और 2005 में 'द ग्रेट सन ऑफ सॉयल' जैसे प्रतिष्ठित अलंकरणों से उन्हें नवाजा गया। ये पुरस्कार इस बात की तस्दीक करते हैं कि वे वास्तविक अर्थों में कर्मठता के पर्याय थे। उनकी कर्मठता और अटूट संकल्प को ये पंक्तियां पूरी तरह बयां करती हैं -

चट्टानों को चीर कर भी, नदियाँ अपना मार्ग बनाती हैं,

एक अडिग प्रतिज्ञा ही तो, सोई किस्मत को जगाती है।

उनका जीवन एक ऐसे बीज की तरह था जिसने खुद को खपाकर एक विशाल वटवृक्ष को जन्म दिया। उन्होंने निष्ठा और कर्मठता की जो समृद्ध विरासत छोड़ी है, वह आज की युवा पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ है।

व्यक्तित्व की अमरता और आने वाले कल की मशाल

एक सामान्य व्यक्ति के जाने के बाद केवल एक खालीपन या रिक्तता पैदा होती है, लेकिन राम अवतार गुप्त जी जैसे संकल्पवान महापुरुष के जाने के बाद एक 'आह्वान' शेष रह जाता है। आज वे हमारे बीच भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा रोपे गए मूल्य-ईमानदारी, निष्पक्षता और सकारात्मक पत्रकारिता-आज भी 'सन्मार्ग' के रूप में अपनी कामयाबी का परचम लहरा रहे हैं। उनका जीवन एक ऐसे बीज की तरह था जिसने खुद को खपाकर एक विशाल वटवृक्ष को जन्म दिया। उन्होंने निष्ठा और कर्मठता की जो समृद्ध विरासत छोड़ी है, वह आज की युवा पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शक प्रकाश स्तंभ है। यह संकल्पशक्ति ही है जो सिद्ध करती है कि व्यक्ति भले चला जाए, उसका 'व्यक्तित्व' और उसकी 'संकल्पशक्ति' हमेशा के लिए अमर हो जाती है। आज जन्म दिवस पर उन्हें कोटि-कोटि नमन।

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