सन्मार्ग संवाददाता
बंगलुरु : जैसे-जैसे शाम आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर, बेंगलुरु पर उतरती गई, आश्रम का वातावरण बंगाल के रंगों में रंगता नजर आया।
महिलाओं की सादगी और गरिमा से सजी जीवंत साड़ियां, खोल और ढाक की मनमोहक लय, धूप की सुगंध और वातावरण में गूंजते बंगाली कीर्तन के स्वर-इन सबने मिलकर पूरे परिसर को बंगाल की सांस्कृतिक छटा से भर दिया। शंखनाद के बीच श्रद्धालु उत्सव में शामिल हुए, वहीं सैकड़ों महिलाओं ने पारंपरिक उलुध्वनि से वातावरण को गुंजायमान कर दिया। संगीत, प्रार्थना और तालियों की गूंज के बीच बंगाल-सिक्किम महोत्सव 2026 ने पश्चिम बंगाल और सिक्किम के विभिन्न हिस्सों से आए 1,500 से अधिक लोगों को एक मंच पर जोड़ा।
इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी, जो सुदूर ग्रामीण इलाकों से सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर अपनी संस्कृति का उत्सव मनाने, आश्रम के आध्यात्मिक वातावरण को अनुभव करने और अपने गुरु-वैश्विक आध्यात्मिक गुरु एवं मानवतावादी गुरुदेव श्री श्री रवि शंकर-के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने पहुंचे थे।
इस उत्सव के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए गुरुदेव श्री श्री रविशंकर ने कहा, “जब मन में शिकायतों का बादल छा जाता है, तो हमारे भीतर का प्रसन्नता का सूर्य ढक जाता है। वह दिखाई नहीं देता। दिन में भी अंधकार छाने लगता है। देवी का आह्वान करने से यह अंधकार दूर हो सकता है।”
देवी के प्रतीकात्मक स्वरूप की व्याख्या करते हुए उन्होंने कहा, “जब राक्षस आए, तब दुर्गा माता ने गहरी सांस लेकर एक प्रचंड हुंकार भरी और सभी राक्षस नष्ट हो गए। यही इस कथा का सार है। हमारे भीतर भी यह ऊर्जा सदैव विद्यमान है। हमें केवल उसका ध्यान करना है और कृतज्ञ होना है।”
महोत्सव में बंगाल की समृद्ध हस्तशिल्प और बुनकर परंपरा की भी झलक देखने को मिली।
प्रदर्शनी में हुगली के हथकरघे और साड़ियां, कल्याणी के आभूषण, तसर सिल्क और क्षेत्रीय वस्त्र, बांकुड़ा की कलात्मक परंपराएं तथा पूर्व मेदिनीपुर की मिठाइयां और पारंपरिक व्यंजन आकर्षण का केंद्र रहे। बेंगलुरु में रह रहे बंगाली समुदायों की ओर से तैयार की गई विभिन्न पहल भी इस अवसर पर प्रदर्शित की गईं।
सभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय शिक्षा एवं उत्तर-पूर्वी क्षेत्र विकास राज्य मंत्री डॉ. सुकांत मजूमदार ने गुरुदेव और आर्ट ऑफ लिविंग के साथ अपने व्यक्तिगत जुड़ाव को साझा करते हुए कहा, “जब से मुझे गुरुदेव से मिलने का अवसर मिला, तब से मैंने एक ही बात समझी है। मुझे लगता है कि उनमें कोई चुंबकीय विशेषता है। जब आप उनसे एक बार मिलते हैं, तो उनसे दोबारा मिलने की इच्छा होती है।”
महोत्सव में प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने पश्चिम बंगाल और सिक्किम की असाधारण सांस्कृतिक विविधता को जीवंत कर दिया। उत्तर बंगाल के राभा, मुंडा और तामांग समुदायों के आदिवासी नृत्यों ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया। सिक्किम की भूटिया, नेपाली और लेपचा परंपराओं पर आधारित लाइव संगीत प्रस्तुति ने क्षेत्र की बहुरंगी सांस्कृतिक विरासत को सामने रखा। इसके साथ ही ‘वंदे मातरम्’ की प्रस्तुति और शिव-शक्ति पर आधारित नाट्य प्रस्तुति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
शिव-शक्ति की प्रस्तुति में शिव और शक्ति की शाश्वत कथा के साथ पवित्र शक्तिपीठों की महिमा को भी दर्शाया गया।
महोत्सव की एक विशेष प्रस्तुति लाइव पटचित्र कहानी-वाचन रही, जिसमें गुरुदेव की 45 वर्षों की यात्रा के प्रमुख पड़ावों को जीवंत किया गया। एक ओर गायक कहानी का वर्णन कर रहा था, वहीं दूसरी ओर कलाकार उसी कथा को कैनवास पर चित्रित करते जा रहे थे। इस अनूठी प्रस्तुति ने कहानी, संगीत और चित्रकला को एक साथ जोड़ दिया।
महोत्सव केवल संस्कृति और परंपरा का उत्सव नहीं था, बल्कि पश्चिम बंगाल में आर्ट ऑफ लिविंग की सेवा पहलों के माध्यम से हो रहे ग्रामीण परिवर्तन की झलक भी प्रस्तुत करता है। कार्यक्रम में शामिल अनेक प्रतिभागी और कलाकार इन सेवा कार्यक्रमों से जुड़े लाभार्थी भी थे। इन पहलों में निःशुल्क शिक्षा, जेल सुधार एवं पुनर्वास, आदिवासी सशक्तीकरण, कौशल विकास और आजीविका से जुड़ी पहल शामिल हैं।
पश्चिम बंगाल में आर्ट ऑफ लिविंग की सेवा गतिविधियों के अंतर्गत 40 से अधिक श्री श्री ज्ञान मंदिर और फीडर स्कूल संचालित किए जा रहे हैं, जो ग्रामीण समुदायों तक शिक्षा पहुंचा रहे हैं। राज्य की विभिन्न जेलों में चलाए जा रहे जेल कार्यक्रम अब तक 34 जेलों के लगभग 5,000 बंदियों तक पहुंच चुके हैं। इसके अलावा, श्री अभयम् के माध्यम से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए प्रशिक्षण, पुरुलिया और अलीपुरद्वार में आदिवासी फुटबॉल कार्यक्रम, महिलाओं के लिए सिलाई एवं आजीविका से जुड़ी पहल, ग्रामीण पुरुलिया में टेलीमेडिसिन सेवाएं तथा मोरिंगा की खेती जैसी कृषि पहलों के माध्यम से भी ग्रामीण समुदायों के सशक्तीकरण का कार्य किया जा रहा है।