कोलकाता : पश्चिम बंगाल विधानसभा में ओबीसी संशोधन विधेयक पेश होने के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर मतभेद खुलकर सामने आ गए। ऋतब्रत बनर्जी और कालीघाट खेमे के विधायकों के बीच इस बात को लेकर विवाद हो गया कि विधेयक का विरोध सदन के भीतर रहकर किया जाए या वॉकआउट किया जाए। बहस के दौरान ऋतब्रत खेमे के अधिकांश विधायक सदन से बाहर निकल गए, जबकि कालीघाट खेमे के विधायक सदन में ही बने रहे।
दिलचस्प बात यह है कि पार्टी की रणनीति स्पष्ट नहीं होने से ऋतब्रत खेमे के छह विधायक बहारुल इस्लाम, काजल शेख, तौसिफुर रहमान, बायरन विश्वास, पन्नालाल हलदार और मोशारफ हुसैन असमंजस में पड़ गए। स्पीकर द्वारा मतदान की घोषणा के बाद सदन छोड़ने की निर्धारित समय-सीमा समाप्त हो जाने के कारण उन्हें बाहर जाने की अनुमति नहीं मिली और वे सदन के भीतर ही रह गए।
इसके बाद इन विधायकों ने सदन के अंदर ही सीधे मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात कर ओबीसी विधेयक पर चर्चा की। पता चला है कि चूंकि इनके निर्वाचन क्षेत्रों में ओबीसी समुदाय की बड़ी आबादी है, इसलिए वे विधेयक पर अपनी बात रखना चाहते थे। विधायकों का कहना था कि बिना किसी पूर्व निर्धारित रणनीति के अचानक वॉकआउट की घोषणा कर दी गई, इसलिए उन्होंने पार्टी लाइन का पालन नहीं किया।
कुणाल घोष ने इन विधायकों के रुख की सराहना की। एक विधायक ने नाराजगी जताते हुए कहा, "यह वॉकआउट पूरी तरह गैर-पेशेवर था। हमें विधेयक पर चर्चा सुननी और उसमें भाग लेना चाहिए था। हमसे कोई सलाह नहीं ली गई। आखिर हम अपने मतदाताओं को क्या जवाब देंगे?" हालांकि, विधेयक पारित होने के बाद वॉकआउट करने वाले सभी विधायक दोबारा सदन में लौट आए। इस पूरे घटनाक्रम ने तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी मतभेद और रणनीतिक असहमति को एक बार फिर उजागर कर दिया।