कोलकाता : किताब सामने है, लेकिन अक्षर दिखाई नहीं देते। ब्लैकबोर्ड पर लिखे शब्दों को पढ़ना संभव नहीं। फिर भी सपनों के पन्नों पर कोई धुंध नहीं। उंगलियां ब्रेल के उभरे अक्षरों पर चलती हैं और कान तकनीक की आवाज में पाठ सुनते हैं। यही वह दुनिया है, जहां दृष्टिबाधित और कम दृष्टि वाले बच्चों ने अपनी मेहनत से सफलता की नई कहानी लिखी है।
सायटसेवर्स इंडिया के इन्क्लूसिव एजुकेशन प्रोग्राम से जुड़े 210 बच्चों ने 2025-26 में कक्षा X और XII की परीक्षाएं दीं। इनमें 103 बच्चों ने प्रथम श्रेणी हासिल की, जबकि 43 ने 70 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त किये। पूरी तरह दृष्टिबाधित 51 विद्यार्थियों में 26 प्रथम श्रेणी में सफल हुए।
इन बच्चों की सफलता केवल परीक्षा के अंकों की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है, जिसमें ब्रेल सामग्री, स्मार्टफोन, लैपटॉप, DAISY प्लेयर और अन्य सहायक तकनीक पढ़ाई की राह आसान बना रहे हैं। मध्य प्रदेश के एक विद्यार्थी ने कक्षा X में 91.4 प्रतिशत, जबकि राजस्थान के एक विद्यार्थी ने कक्षा XII में 93.4 प्रतिशत अंक हासिल किये।
पश्चिम बंगाल में भी तस्वीर उत्साहजनक रही। यहां कक्षा XII में एक विद्यार्थी ने 88.6 प्रतिशत अंक प्राप्त किये। यानी रोशनी आंखों में हो या न हो, सफलता की चमक हौसलों से पैदा होती है।
संस्था का दावा हैं कि जून 2026 तक कार्यक्रम के तहत 2,731 बच्चों को ICT और अन्य सहायक उपकरण तथा 5,968 सुलभ शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध करायी गयी। साथ ही 5,725 बच्चों को प्रशिक्षण मिला। शिक्षकों, अभिभावकों और शिक्षा अधिकारियों को भी संवेदनशील बनाने पर जोर दिया गया।
इस पहल का मकसद केवल बच्चों को परीक्षा पास कराना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाना है। ब्रेल से लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, 3D मॉडल और AR/VR जैसी तकनीक तक शिक्षा की दुनिया उनके लिए लगातार खुल रही है।
इन बच्चों की कहानी एक सीधा संदेश देती है—दृष्टि की कमी सपनों की सीमा नहीं होती। जरूरत सिर्फ इतनी है कि शिक्षा की राह में खड़ी दीवारें हटा दी जाएं।