कोलकाता सिटी

जब श्रद्धालुओं की सेवा में झलकी अल्लाह की इबादत

मोक्ष की राह में मददगार ऑटो चालक अकबर खान।

Narendra Kumar Singh

प्रसेनजीत, सन्मार्ग संवाददाता

सागर: गंगासागर मेला आस्था का महासंगम होने के साथ-साथ सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास की जीवंत तस्वीर भी पेश करता है। इसी सौहार्द की एक सशक्त मिसाल हैं सागर तटीय इलाके के 60 वर्षीय ऑटो रिक्शा चालक अकबर खान। साधारण जीवन जीने वाले अकबर खान अपने कर्मों से यह साबित करते हैं कि इंसानियत किसी धर्म की मोहताज नहीं होती।

पिछले कई वर्षों से वे गंगासागर मेले के दौरान देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालुओं को कपिल मुनि मंदिर, सागर तट और शाही स्नान स्थलों तक पहुंचाने में जुटे रहते हैं। भीड़, थकान और उम्र की सीमाओं के बावजूद उनकी सेवा में कोई कमी नहीं आती। उनके लिए हर यात्री आस्था से भरा एक साधक है। अकबर खान कहते हैं, “माशा अल्लाह, हर साल भीड़ बढ़ती जा रही है। लोग यहां मोक्ष की कामना लेकर आते हैं। उनकी मदद करना मेरा फर्ज़ है।” वे आगे कहते हैं, “मेरे लिए यह इलाका ही मेरा मक्का मदीना है। जैसे मैं अल्लाह की इबादत करता हूं, वैसे ही इन श्रद्धालुओं की सेवा करता हूं।”

हिंदू श्रद्धालुओं के बीच एक मुस्लिम बुज़ुर्ग ऑटो चालक का यह भाव गंगा-जमुनी संस्कृति की सबसे सुंदर तस्वीर पेश करता है। न धर्म का भेद, न भाषा का फर्क—बस सेवा और सम्मान। श्रद्धालु भी उन्हें ‘अकबर चाचा’ कहकर अपनापन जताते हैं। गंगासागर मेले की आपाधापी में अकबर खान का ऑटो भरोसे, सौहार्द और इंसानियत का चलता-फिरता प्रतीक बन चुका है। उनकी कहानी बताती है कि सच्चा साम्प्रदायिक सद्भाव किसी भाषण में नहीं, बल्कि ऐसे ही निःस्वार्थ कर्मों में जीवित रहता है।

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