कोलकाता : आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं के एक महत्वपूर्ण अध्ययन में खुलासा हुआ है कि शहरों का विकास किस प्रकार हुआ है, इसका भविष्य में उनकी कूलिंग (शीतलन) जरूरतों और ऊर्जा खपत पर सीधा प्रभाव पड़ता है। यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हुआ है।
अध्ययन के अनुसार, केवल जलवायु परिवर्तन और बढ़ते वैश्विक तापमान ही कूलिंग की बढ़ती मांग के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि शहरों के विस्तार का स्वरूप, इमारतों का घनत्व, हरित क्षेत्रों का संरक्षण, सड़कों और भवनों का निर्माण तथा शहरी नियोजन भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। यही कारण है कि समान जलवायु वाले दो शहरों की कूलिंग और ऊर्जा जरूरतें एक-दूसरे से काफी अलग हो सकती हैं।
शोधकर्ताओं ने इस प्रभाव को "थर्मल मेमोरी" नाम दिया है। उनका कहना है कि दशकों पहले लिए गए शहरी विकास संबंधी फैसले आज भी शहरों के तापमान और ऊर्जा खपत को प्रभावित कर रहे हैं। यदि भविष्य में टिकाऊ और संतुलित शहरी विकास नहीं अपनाया गया तो कूलिंग की मांग और बिजली की खपत में लगातार वृद्धि हो सकती है।
यह अध्ययन आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने कलकत्ता विश्वविद्यालय, एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी, नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के सहयोग से किया। इसमें 2003 से 2023 तक के उपग्रह चित्रों और जलवायु आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में भारत के 88 और दुनिया के 52 प्रमुख शहरों, जिनमें कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, लंदन, टोक्यो और न्यूयॉर्क शामिल हैं, को शामिल किया गया।