कोलकाता: एक कमरे में इतिहास चुपचाप खड़ा था। सामने शय्या पर पड़े थे एक वृद्ध शिक्षक। दरवाजे से भीतर आया वह शिष्य, जिसे दुनिया नोबेल विजेता के रूप में पहचानती थी। हाथ में था नोबेल पदक, आंखों में नमी और मन में दशकों पुरानी कृतज्ञता।
उसने जूते उतारे, गुरु के चरणों में सिर रख दिया और अपना पदक उनके हाथों में सौंप दिया, कहा - 'इस सम्मान का हक़दार सिर्फ आप हैं, सर!' कोलकाता ने वर्ष 1981 में गुरु-शिष्य के रिश्ते का यह अद्भुत दृश्य देखा था। शिष्य थे पाकिस्तान के महान भौतिक विज्ञानी नोबेल बिजेता डॉ. अब्दुस सलाम और गुरु थे उनके बंगाली ‘मास्टर जी’ प्रो. अनिलेंद्रनाथ गांगुली।
कहानी लौटती है 1940 के दशक के लाहौर में। सनातन धर्म कॉलेज (वर्तमान में अम्बाला कैंटोंमेंट में स्थित) की गणित कक्षा में एक तेजस्वी छात्र बैठता था—अब्दुस सलाम। प्रतिभा प्रखर थी, पर मन चंचल। एक दिन गणित की कक्षा में उनकी नजर खिड़की के बाहर थी। शिक्षक की नजर पड़ी। डांट मिली, कक्षा से बाहर जाने का आदेश भी।
लेकिन महान शिक्षक केवल डांटते नहीं, प्रतिभा को पहचानते भी हैं। कक्षा खत्म होने के बाद प्रो. गांगुली ने उसी छात्र को बुलाया। स्नेह से गणित समझाया। शायद उस दिन गुरु ने एक छात्र नहीं, भविष्य के महान वैज्ञानिक को देखा था।
दशकों बाद 1979 में सलाम ने भौतिकी का नोबेल पुरस्कार जीता। शेल्डन ग्लाशो और स्टीवन वाइनबर्ग के साथ इलेक्ट्रोवीक एकीकरण के सिद्धांत में योगदान के लिए उन्हें यह सम्मान मिला। दुनिया ने उन्हें सलाम किया, मगर सलाम के मन में अपने ‘मास्टर जी’ की तस्वीर जीवित रही।
अस्सी के दशक में कलकत्ता विश्वविद्यालय के आमंत्रण पर कोलकाता लौटकर उन्होंने बीमार गुरु को खोज निकाला। मुलाकात हुई तो शब्द अनावश्यक हो गये। शिष्य झुका, गुरु ने हाथ थामा और नोबेल पदक उनके हाथों में आ गया। दो आंखों से निकले आंसुओं ने चार दशक की कहानी कह दी।
वह पदक सलाम के नाम था, मगर उस क्षण उसकी चमक गुरु के चरणों में थी। यही शिक्षक की सबसे बड़ी जीत है—जब दुनिया शिष्य को पहचानती है और शिष्य अपनी पहचान का श्रेय गुरु को देता है।