पूजा पंडाल में सजी मां दुर्गा की प्रतिमा Pinterest
कोलकाता सिटी

सितंबर में क्यों बदलने लगता है कोलकाता?

दुर्गापूजा से पहले बाजारों, घरों और कुम्हारटोली में दिखने लगती है त्योहार की तैयारी

Tanisha Hirawat

कोलकाता: बारिश और उमस के बीच भी इस महीने शहर की दिनचर्या में धीरे-धीरे बदलाव दिखने लगता है। बाजारों में त्योहार की खरीदारी की तैयारी शुरू हो जाती है, घरों में नए कपड़ों और साज-सज्जा की बातें होने लगती हैं और कुम्हारटोली में दुर्गापूजा की तैयारियां अंतिम दौर की ओर बढ़ती हैं। दुर्गापूजा आने में अभी समय है, लेकिन उसका असर शहर की रोजमर्रा की जिंदगी में सितंबर से ही दिखने लगता है।

सितंबर के साथ दुर्गापूजा का बेसब्री से इंतजार करते लोग

बाजारों में बढ़ने लगती है हलचल

सितंबर के साथ दुर्गापूजा की खरीदारी तेज होने लगती है। कोलकाता के प्रमुख बाजारों में नए कपड़े, साड़ियां, जूते और आभूषण खरीदने की तैयारी शुरू हो जाती है। किस दिन क्या पहनना है, किसके लिए क्या खरीदना है और इस बार पूजा में क्या नया किया जाए, इन सवालों पर घरों में चर्चा होने लगती है। पूजा की खरीदारी का असली जोर महालया के करीब पहुंचते-पहुंचते और बढ़ता है

ढाक की थाप के साथ शुरू होती पूजा की रौनक

अलमारी में बनने लगती है त्योहार की जगह

सितंबर का असर घरों की अलमारी पर भी दिखाई देता है। रोजमर्रा के कपड़ों के बीच अचानक साड़ी, कुर्ते, नए आभूषण और त्योहार के कपड़ों के लिए जगह बनने लगती है। कई लोग पूजा के पांचों दिनों के लिए अलग-अलग पहनावे की योजना भी बनाने लगते हैं। पारंपरिक साड़ियों और त्योहार के पहनावे को लेकर भी इस समय लोगों की दिलचस्पी बढ़ने लगती है।

मां दुर्गा की प्रतिमा को अंतिम रूप देता कलाकार

कुम्हारटोली में पहले से शुरू है तैयारी

जिस दुर्गापूजा का इंतजार शहर सितंबर में महसूस करना शुरू करता है, उसकी तैयारी कुम्हारटोली में काफी पहले से चल रही होती है। सितंबर आते-आते मां दुर्गा की प्रतिमाओं पर काम महत्वपूर्ण दौर में पहुंच जाता है। इस साल बारिश और मिट्टी से जुड़ी परेशानियों ने कारीगरों के काम को भी प्रभावित किया है। यानी शहर के लिए पूजा अभी आने वाली है, लेकिन कुम्हारटोली के लिए उसका समय पहले ही शुरू हो चुका है।

मौसम वही, एहसास बदल जाता है

दिलचस्प बात यह है कि सितंबर में कोलकाता का मौसम अचानक ठंडा या पूरी तरह सुहावना नहीं हो जाता। इस महीने शहर में अच्छी-खासी बारिश होती है। इसके बावजूद माहौल बदलने लगता है। बारिश के बीच पूजा की खरीदारी, त्योहार की तैयारियां और आने वाले दिनों की योजनाएं शहर की रफ्तार में एक अलग रंग भर देती हैं।

फिर बातचीत में भी पूजा धीरे-धीरे जगह बनाने लगती है, खरीदारी कब करनी है, क्या पहनना है, कौन-सा पंडाल देखना है और इस बार पूजा कैसे मनानी है। शायद यही कोलकाता की खासियत है। यहां दुर्गापूजा केवल पांच दिनों में नहीं आती। वह पहले बाजारों में दिखाई देती है, फिर घरों में जगह बनाती है और आखिर में लोगों की बातचीत का हिस्सा बन जाती है। सितंबर बस वह महीना है, जब शहर को महसूस होने लगता है कि पूजा अब ज्यादा दूर नहीं।

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