नुमान प्रसाद पोद्दार 
कोलकाता सिटी

श्रीराधा-कृष्ण एक ही तत्व के दो स्वरूप

नित्य अभिन्न है प्रिया-प्रियतम संबंध

Ravi

कोलकाता : नित्यलीलालीन भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार ने श्रीराधा-कृष्ण के स्वरूप और उनके शाश्वत संबंध की व्याख्या करते हुए कहा है कि श्रीराधा और श्रीकृष्ण वस्तुतः एक ही तत्व के दो नाम और दो स्वरूप हैं

दोनों के बीच नित्य और अभिन्न संबंध है। इसलिए उनके विवाह होने या न होने का प्रश्न लौकिक दृष्टि से ही देखा जा सकता है, जबकि आध्यात्मिक स्तर पर दोनों सदा एक ही तत्व के रूप में विद्यमान हैं।

श्रीराधा हैं श्रीकृष्ण की ह्लादिनी शक्ति

भाईजी के अनुसार श्रीराधारानी गोलोकधाम की अधीश्वरी हैं। वे श्रीकृष्ण से नित्य अभिन्न होते हुए भी उनकी ह्लादिनी शक्ति के रूप में भगवान को परम आनंद प्रदान करती हैं। श्रीकृष्ण के स्वरूप का आधार श्रीराधा हैं और श्रीराधा के स्वरूप का आधार श्रीकृष्ण हैं। दोनों का संबंध नित्य प्रिया-प्रियतम का है और इसमें कभी वास्तविक वियोग नहीं होता।

उन्होंने स्पष्ट किया कि इस दिव्य प्रिया-प्रियतम भाव की तुलना सांसारिक संबंधों से नहीं की जा सकती। जिस प्रकार भगवान का स्वरूप लौकिक सीमाओं से परे और अचिन्त्य है, उसी प्रकार श्रीराधा-कृष्ण का दिव्य संबंध भी अनिर्वचनीय और अतुलनीय है।

गोलोकधाम में विद्यमान हैं दिव्य ब्रज प्रदेश

आध्यात्मिक वर्णन के अनुसार गोलोकधाम सच्चिदानंदमय परमधाम है और इसे समस्त ब्रह्मांड का आत्मस्वरूप बताया गया है। इसी दिव्य धाम में वृंदावन, मथुरा, गोकुल, नंदग्राम, बरसाना, गिरिराज, विरजा और यमुना जैसे शाश्वत दिव्य प्रदेश विद्यमान हैं।

भाईजी ने बताया कि पृथ्वी पर स्थान अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन दिव्य सच्चिदानंदमय धाम की प्रकृति भौतिक जगत जैसी नहीं है। वहां विभिन्न दिव्य लोक अपने-अपने स्वरूप में होते हुए भी आध्यात्मिक स्तर पर एक ही परम सत्य में स्थित माने जाते हैं।

योगमाया के माध्यम से हुई ब्रज में अवतरण लीला

श्रीराधा-कृष्ण के पृथ्वी पर प्राकट्य को भी दिव्य लीला का हिस्सा बताया गया है। इसके अनुसार भगवान की योगमाया ने लीलावैचित्र्य के लिए श्रीराधारानी के समक्ष एक स्वप्न का दृश्य प्रस्तुत किया। इस संकल्प के अनुरूप भारतवर्ष के ब्रजमंडल में वृषभानुपुरी में श्रीराधारानी के प्राकट्य की लीला हुई।

इसी प्रकार श्रीकृष्ण का भी संकल्पपूर्वक अवतरण हुआ। ब्रज में दोनों ने बाल्यकाल में प्रथम दर्शन, पूर्वराग, संयोग और विभिन्न रसलीलाओं का अनुभव कराया। लोकदृष्टि से दोनों के विवाह की चर्चाएं भी सामने आईं।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में विवाह का उल्लेख

भाईजी के अनुसार कुछ भक्तों ने श्रीराधा-कृष्ण के विवाह का वर्णन भी किया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में वर्णित प्रसंग के अनुसार ब्रह्माजी ने वृंदावन में सखियों की उपस्थिति में श्रीराधा और श्रीकृष्ण का विवाह संपन्न कराया था। हालांकि आध्यात्मिक दृष्टि से यह विवाह भी उनके पहले से विद्यमान नित्य और अभिन्न संबंध की लौकिक लीला के रूप में देखा जाता है।

इसके बाद श्रीकृष्ण मथुरा और फिर द्वारका चले गए। वहीं श्रीराधारानी ने विरह में प्रेम और भक्ति से परिपूर्ण जीवन बिताया। यह विरह भी उनके नित्य संबंध से अलगाव नहीं, बल्कि दिव्य लीला का ही एक स्वरूप माना गया है।

अंततः ब्रजवासियों का गोलोकधाम गमन

श्रीकृष्ण की अवतार-लीला पूर्ण होने के समय ब्रज के गोप-गोपियों और समस्त ब्रजमंडल को भगवान ने गोलोकधाम भेज दिया। इस प्रसंग को श्रीराधा-कृष्ण की दिव्य लीला के समापन से जोड़ा गया है।

भाईजी के वर्णन में अंततः श्रीराधारानी का स्वप्न भंग होता है और उन्हें अनुभव होता है कि वे वास्तव में अपने प्रियतम श्रीकृष्ण के साथ ही हैं। पृथ्वी पर दिखाई देने वाली समस्त घटनाएं एक दिव्य स्वप्न अथवा लीला के समान थीं।

नित्य सनातन है श्रीराधा-कृष्ण का संबंध

इस आध्यात्मिक चिंतन का सार यही है कि श्रीराधा और श्रीकृष्ण नित्य, सनातन और परस्पर अभिन्न प्रिया-प्रियतम हैं उनका स्वरूप मानवीय तर्क और लौकिक दृष्टि से परे माना गया है। उनके दिव्य स्वरूप और प्रेम का अनुभव भी उनकी कृपा से ही संभव बताया गया है।

भाईजी हनुमान प्रसाद पोद्दार के अनुसार श्रीराधा-कृष्ण का आदर्श केवल सांसारिक प्रेम की कथा नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम, भक्ति और परमात्मा से जीव के संबंध का अत्यंत गहन आध्यात्मिक प्रतीक है।

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