सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : बिजनेस एंड इकोनॉमी लिटरेचर क्लब (BELC) ने शुक्रवार को भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR), कोलकाता में कुवैत स्थित भारतीय पत्रकार एवं लेखिका चैताली बनर्जी रॉय की पुस्तक 'सदाका: पार्टनरशिप एंड कल्चरल किनशिप' का लोकार्पण किया। यह पुस्तक भारत और कुवैत के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक तथा जन-जन के रिश्तों की गहराई और उनकी स्थायी साझेदारी को रेखांकित करती है।
पुस्तक का लोकार्पण डॉ. रूपाली बसु, रीजनल हेड (पूर्व एवं आंध्र प्रदेश), एचसीजी कैंसर हॉस्पिटल्स; अजेय बंद्योपाध्याय, वरिष्ठ अंतरराष्ट्रीय विकास विशेषज्ञ (विश्व बैंक समूह) एवं बिजनेस एंड इकोनॉमी लिटरेचर क्लब के संयोजक; डॉ. बिदिशा बनर्जी, एसोसिएट प्रोफेसर एवं कार्यवाहक विभागाध्यक्ष, साहित्य एवं सांस्कृतिक अध्ययन विभाग, द एजुकेशन यूनिवर्सिटी ऑफ हांगकांग; तथा प्रसिद्ध वाचिका ब्रतती बंद्योपाध्याय की गरिमामयी उपस्थिति में हुआ।
अरबी भाषा में 'सदाका' का अर्थ है 'मित्रता'। यह पुस्तक प्रतिष्ठित कुवैती और भारतीय व्यक्तित्वों के साथ हुई बातचीत का संकलन है, जिनके जीवन और कार्य दोनों देशों के गहरे संबंधों को प्रतिबिंबित करते हैं। इसमें शेखा सौद अल सबाह, शेखा हलाह बदर अल मोहम्मद अल सबाह, पद्मश्री शेखा शैखा अल सबाह, समाजशास्त्री डॉ. लुबना अल क़ादी तथा उद्योगपति टोनी जशनमल जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं।
पुस्तक में कुवैत और खाड़ी क्षेत्र में भारतीय समुदाय की अग्रणी हस्तियों और उद्यमियों की प्रेरक यात्राओं को भी स्थान दिया गया है। इनमें किटको के धीरज ओबेरॉय, दावत के रवि कोहली, अल मैलेम के कुलदीप सिंह लांबा तथा समारा ग्रुप ऑफ कंपनीज़ के संस्थापक एस. के. वाधवान शामिल हैं। इन सभी की कहानियाँ व्यापार, उद्यमिता, शिक्षा, कूटनीति और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से भारत–कुवैत संबंधों को मजबूत करने की प्रेरक गाथा प्रस्तुत करती हैं।
इस अवसर पर चैताली बनर्जी रॉय ने कहा कि 'सदाका' की प्रेरणा उन्हें उन वास्तविक कहानियों से मिली, जो वर्षों से भारत और कुवैत के बीच सांस्कृतिक समानताओं और मित्रता को उजागर करती रही हैं। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक उन व्यक्तियों के योगदान को सम्मानित करने का प्रयास है, जिन्होंने दोनों देशों के बीच संबंधों को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने साहित्य और सांस्कृतिक कूटनीति को अंतरराष्ट्रीय समझ और संवाद को बढ़ावा देने का प्रभावी माध्यम बताया। उन्होंने इस पुस्तक को भारत और कुवैत की साझा विरासत, पारस्परिक सम्मान और स्थायी मित्रता का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बताया।
कार्यक्रम का समापन लेखक के साथ संवाद, पुस्तक हस्ताक्षर सत्र तथा राजनयिकों, शिक्षाविदों, साहित्य प्रेमियों, पेशेवरों और मीडिया प्रतिनिधियों के बीच विचार-विमर्श के साथ हुआ। इस अवसर ने एक बार फिर यह सिद्ध किया कि साहित्य साझा इतिहास को संरक्षित करने और देशों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत बनाने का सशक्त माध्यम है।