सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में युवा महिला डॉक्टर के साथ कथित दुष्कर्म और हत्या के मामले में परिवार की मांग पर हाईकोर्ट द्वारा नई जांच के आदेश के बाद अब सीबीआई उन 38 बिंदुओं और खामियों पर ध्यान दे रही है, जिन्हें परिवार ने पहले की जांचों में नजरअंदाज किए जाने का आरोप लगाया है।
परिवार का आरोप है कि पहले पुलिस और बाद में सीबीआई द्वारा की गई जांच में कई गंभीर कमियां रह गईं। नई जांच शुरू होने के बाद अदालत में परिवार द्वारा जमा कराई गई खामियों की सूची भी अब जांच एजेंसी के संज्ञान में है।
परिवार की सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि "लास्ट सीन टुगेदर थ्योरी" (अंतिम बार किसके साथ देखा गया था) को महत्व नहीं दिया गया। इस सिद्धांत के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को आखिरी बार कुछ लोगों के साथ जीवित देखा गया हो और बाद में वह मृत मिले, तो उन लोगों को यह स्पष्ट करना होता है कि वे उससे कब और किन परिस्थितियों में अलग हुए। परिवार का आरोप है कि न पुलिस और न ही सीबीआई ने इस पहलू पर गंभीरता से ध्यान दिया। मृतक डॉक्टर के साथ आखिरी बार डिनर करने वाले लोगों की भूमिका अब फिर से जांच के दायरे में आ सकती है।
9 अगस्त 2024 को शव मिलने के बाद सामने आए वीडियो फुटेज में घटना स्थल के अंदर बार-बार बेडशीट बदलती दिखाई देती है—कभी नीली, कभी आसमानी और कभी हरी। परिवार और उनके वकीलों का कहना है कि यदि वहां दुष्कर्म और हत्या हुई होती, तो मृतका की चप्पलें इतनी व्यवस्थित तरीके से एक साथ रखी नहीं मिलतीं। सीबीआई की विशेष जांच टीम को अब इस पहलू की भी जांच करनी होगी।
मोबाइल से रिकॉर्ड किए गए विभिन्न वीडियो में मृतका का शव कभी प्लेटफॉर्म पर तो कभी गद्दे पर रखा हुआ दिखाई देता है। वीडियो के अनुसार उनके दोनों पैर बिल्कुल समानांतर स्थिति में थे। परिवार का दावा है कि यदि हत्या उसी स्थान पर हुई होती, तो शव की स्थिति ऐसी नहीं होती। कुछ वीडियो में शरीर के कुछ हिस्से खुले दिखाई देते हैं, जबकि बाद की तस्वीरों में शव ढका हुआ दिखता है।
परिवार की ओर से हाईकोर्ट में पैरवी कर रहे अधिवक्ता शिर्षेंदु सिंह राय का कहना है कि सीसीटीवी फुटेज में कम से कम 62 लोग उस मंजिल पर शव के आसपास घूमते दिखाई देते हैं। सवाल यह है कि उनमें से कितनों से वास्तव में पूछताछ की गई?
परिवार ने मामले से जुड़े दस्तावेज और वीडियो फुटेज सेवानिवृत्त फॉरेंसिक विशेषज्ञ अजय कुमार गुप्ता को भी दिखाए थे। उनकी राय भी अदालत में प्रस्तुत की गई है। उनका मानना है कि यह पूरी घटना किसी एक व्यक्ति द्वारा अंजाम देना संभव नहीं था।
परिवार का यह भी आरोप है कि इनक्वेस्ट रिपोर्ट (प्रारंभिक जांच रिपोर्ट) में जिन चोटों का उल्लेख किया गया था, उनमें से कम से कम 10 चोटों का पोस्टमार्टम रिपोर्ट में कोई उल्लेख नहीं है। उनका दावा है कि घटना स्थल भी बदला गया और अंततः एक हॉल को ही आधिकारिक घटनास्थल मानकर जांच आगे बढ़ाई गई, जिससे कई महत्वपूर्ण सबूत नष्ट हो गए।
परिवार ने यह सवाल भी उठाया है कि टाला थाने के तत्कालीन ओसी (थाना प्रभारी) की गिरफ्तारी के बावजूद उनकी गवाही के आधार पर कोई नई गिरफ्तारी क्यों नहीं हुई। यदि उन्होंने सचमुच सबूत मिटाने का काम किया, तो उन्होंने यह किसके निर्देश पर किया?
इसके अलावा परिवार का प्रश्न है कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी दोषी ठहराए गए संजय राय से दोबारा पूछताछ क्यों नहीं की गई।