कोलकाता: “नमस्कार, आप देख रहे हैं एबीपी आनंद, आपके साथ हूं मैं पापिया...” बंगाली समाचार चैनल देखने वाले कई दर्शकों के लिए यह सिर्फ खबरों की शुरुआत नहीं, बल्कि एक जानी-पहचानी आवाज से मुलाकात थी। वर्षों तक टेलीविजन के पर्दे पर खबरें पढ़ने और घटनाओं का विश्लेषण करने वाली पत्रकार एवं समाचार प्रस्तोता पापिया सिंह देबनाथ का आठ अक्टूबर को 47 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह लंबे समय से कैंसर से जूझ रही थीं। उनके निधन से बंगाल के पत्रकारिता जगत में शोक की लहर है।
पापिया का जन्म 7 मार्च 1979 को हुआ था। उन्होंने अपने पेशेवर जीवन का बड़ा हिस्सा बंगाली समाचार जगत को दिया। उनकी स्पष्ट उच्चारण शैली, सहज प्रस्तुति और गंभीर आवाज ने उन्हें दर्शकों के बीच खास पहचान दिलाई। राजनीति से लेकर ताजा घटनाओं, मनोरंजन और खेल तक, अलग-अलग विषयों की खबरें प्रस्तुत करने में उनकी मजबूत पकड़ थी।
पापिया सिंह देबनाथ एबीपी आनंद के उन पहचाने जाने वाले चेहरों में शामिल थीं, जिनकी मौजूदगी दर्शकों के लिए परिचित और भरोसेमंद बन गई थी। उन्होंने दो दशक से अधिक समय तक टेलीविजन पत्रकारिता में काम किया। खबरों को स्पष्टता और बारीकी से दर्शकों तक पहुंचाना उनकी प्रस्तुति की खासियत थी।
समाचार प्रस्तुति में भाषा की शुद्धता, आवाज का उतार-चढ़ाव और घटनाओं को सहज ढंग से समझाने की क्षमता महत्वपूर्ण होती है। पापिया की पहचान इन खूबियों से बनी। राजनीतिक घटनाक्रम हो या अचानक सामने आई कोई बड़ी खबर, उनकी प्रस्तुति में गंभीरता और स्पष्टता दिखाई देती थी।
दुर्गापूजा के दौरान विशेष कार्यक्रमों और मैदान से होने वाली सीधी प्रस्तुतियों में भी उनकी मौजूदगी खास रहती थी। त्योहारों की रौनक के बीच दर्शकों तक खबरें पहुंचाने वाली पापिया के लिए यह समय उनके पेशेवर जीवन का अहम हिस्सा था। ऐसे में दुर्गापूजा के मौसम में उनके निधन की खबर ने उनके दर्शकों और सहकर्मियों को विशेष रूप से भावुक कर दिया।
पापिया की पहचान केवल समाचार कक्ष और टेलीविजन स्टूडियो तक सीमित नहीं थी। उन्हें जीवन की छोटी-छोटी खुशियों से लगाव था। उन्हें प्रकृति और बागवानी पसंद थी। पौधों में फूल खिलने पर वह उनकी तस्वीरें सामाजिक माध्यमों पर साझा करती थीं और अपने सहकर्मियों को भी उत्साह से दिखाती थीं।
काम के दबाव और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच भी वह जीवन के इन छोटे पलों के लिए समय निकालती थीं। उनके सहकर्मियों के लिए वह सिर्फ एक पेशेवर पत्रकार नहीं, बल्कि एक ऐसी साथी थीं, जिनकी मुस्कान और उत्साह को याद किया जाएगा।
उनकी निजी जिंदगी और पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाए रखने का यह पक्ष भी उनके व्यक्तित्व को समझने में मदद करता है। लंबे समय तक समाचार जगत में काम करना आसान नहीं होता। लगातार बदलती खबरें, समय की पाबंदी और दर्शकों तक सही जानकारी पहुंचाने की जिम्मेदारी इस पेशे का हिस्सा हैं। पापिया ने वर्षों तक इन जिम्मेदारियों को निभाया।
पापिया लंबे समय से कैंसर का इलाज करा रही थीं। बीमारी के बावजूद वह जीवन के प्रति सकारात्मक रहने की कोशिश करती रहीं। आठ अक्टूबर की सुबह उनकी तबीयत बिगड़ने के बाद उनका निधन हो गया। उनके इलाज और बीमारी से जुड़ी चुनौतियों के बीच परिवार, मित्रों और सहकर्मियों को उनके लौटने की उम्मीद थी, लेकिन वह उम्मीद पूरी नहीं हो सकी।
उनके निधन की खबर ने बंगाली समाचार जगत में एक ऐसी कमी का एहसास कराया, जिसे केवल एक परिचित चेहरे के चले जाने के रूप में नहीं देखा जा सकता। वर्षों तक दर्शकों के घरों तक खबरें पहुंचाने वाले पत्रकारों से लोगों का एक अनकहा रिश्ता बन जाता है। पापिया भी इसी रिश्ते का हिस्सा थीं।
पापिया की विरासत किसी एक बड़ी खबर या एक खास कार्यक्रम तक सीमित नहीं है। यह उन वर्षों में है, जिनमें उन्होंने रोजाना दर्शकों तक खबरें पहुंचाईं, घटनाओं को समझाया और अपने काम के जरिए पहचान बनाई। समाचार प्रस्तुति के पेशे में निरंतरता और दर्शकों का भरोसा लंबे समय में अर्जित होता है। पापिया ने अपने करियर में यही जगह बनाई थी।
उनके निधन के बाद सहकर्मी और दर्शक उन्हें उनकी स्पष्ट आवाज, सहज अंदाज और स्क्रीन पर उनकी परिचित मौजूदगी के लिए याद करेंगे। खबरों की दुनिया में चेहरे बदलते रहते हैं, लेकिन कुछ आवाजें लंबे समय तक लोगों की स्मृतियों में बनी रहती हैं। पापिया सिंह देबनाथ उन्हीं में से एक थीं।