कोलकाता : भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता निस्वार्थ प्रेम, समर्पण और आत्मीयता का अनुपम उदाहरण है। सुदामा का नाम सुनते ही भगवान कृष्ण नंगे पैर उनसे मिलने दौड़ पड़े थे। यह प्रसंग हमें सच्ची मित्रता और भक्त के प्रति भगवान के प्रेम का संदेश देता है।
यह विचार राष्ट्रसंत श्री गोविंददेव गिरिजी ने श्रीमद्भागवत कथा के सातवें एवं अंतिम दिन व्यक्त किए। श्री दाधीच परिषद (कोलकाता) की ओर से गोलाघाटा स्थित डीबीनीटी पैवेलियन में गंगासागर धाम में भवन निर्माण प्रकल्प के लिए सप्ताहव्यापी कथा का आयोजन किया गया।
कथाव्यास ने सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए बताया कि अत्यंत गरीबी में जीवन बिताने के बावजूद सुदामा सदैव भगवान के स्मरण में लीन रहते थे। पत्नी सुशीला के आग्रह पर वे द्वारका पहुंचे। जैसे ही भगवान कृष्ण को उनके आगमन की सूचना मिली, वे नंगे पैर दौड़कर आए और मित्र को गले लगा लिया।
कृष्ण ने सुदामा के चरण धोए और उनका आत्मीय स्वागत किया। उनकी दीन-दशा देखकर भगवान की आंखों से आंसू बहने लगे। सुदामा को भगवान की कृपा से सुख-सुविधाएं मिलीं, लेकिन उन्होंने सादगी और भक्ति का मार्ग नहीं छोड़ा।
गोविंददेव गिरिजी ने परीक्षित मोक्ष प्रसंग सुनाते हुए कहा कि शुकदेवजी ने राजा परीक्षित को सात दिनों तक भागवत कथा सुनाई, जिससे उनका मृत्यु भय समाप्त हो गया। कथा श्रवण के प्रभाव से उन्होंने परमधाम प्राप्त किया। स्वामीजी ने कहा कि भगवान सदैव प्रसन्न रहते हैं और हास्य एक अद्भुत रसायन है। विश्व शांति के लिए भारतीय जीवन पद्धति को अपनाने की आवश्यकता है।
कथा से पूर्व श्री दाधीच परिषद के सचिव आर.के. व्यास का शॉल, माला और साफा पहनाकर सम्मान किया गया। स्वामीजी ने गंगासागर धाम के भवन निर्माण प्रकल्प के लिए परिषद को दो लाख रुपये प्रदान किए।
समापन अवसर पर ओम जालान, श्रीकुमार तोषनीवाल, निर्मल सराफ, अशोक चूड़ीवाल, रमाकांत पंसारी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे। अनुराग शर्मा, पंकज शर्मा, सुनील दाधीच, संदीप दाधीच, अलका काकड़ा, रेणु मिश्रा और प्रियंका दाधीच सहित अनेक कार्यकर्ताओं ने सहयोग दिया। परिषद के सचिव आर.के. व्यास ने बताया कि आरती, हवन और प्रसाद वितरण के साथ सात दिवसीय भागवत कथा का समापन हुआ।