कोलकाता : उत्तर कोलकाता के प्रसिद्ध कुम्हारटोली में इस वर्ष खुशियों की नई लहर देखने को मिल रही है। परंपरागत रूप से दुर्गा प्रतिमाओं के निर्माण के लिए प्रसिद्ध इस शिल्प नगरी में अब गणेश चतुर्थी के लिए गणपति प्रतिमाओं के ऑर्डर तेजी से आने लगे हैं।
लगातार मिल रहे इन ऑर्डरों ने मूर्तिकारों के चेहरों पर मुस्कान लौटा दी है और कई कारीगरों का कहना है कि लंबे समय बाद उनके लिए आर्थिक राहत की उम्मीद जगी है।
कुम्हारटोली के कई मूर्तिकारों का कहना है कि पहले उनका अधिकांश काम केवल दुर्गापूजा पर निर्भर रहता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा, झारखंड, असम और देश के अन्य राज्यों से गणपति प्रतिमाओं की मांग लगातार बढ़ी है। इस बार उल्टो रथ के दिन से ही बड़ी संख्या में नए ऑर्डर मिलने शुरू हो गए हैं।
कारीगरों के अनुसार, दुर्गा प्रतिमाओं के निर्माण का व्यस्त दौर शुरू होने से पहले गणपति प्रतिमाओं का काम उन्हें अतिरिक्त आय का अवसर देता है। इससे न केवल कलाकारों को आर्थिक संबल मिलता है, बल्कि उनके साथ काम करने वाले श्रमिकों, रंगकर्मियों और अन्य सहयोगियों को भी रोजगार मिलता है।
कई कार्यशालाओं में अभी से गणपति प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम तेज हो गया है ताकि समय पर विभिन्न राज्यों में उनकी आपूर्ति की जा सके।
मूर्तिकारों का कहना है कि अब ग्राहक केवल पारंपरिक मिट्टी की प्रतिमाएं ही नहीं, बल्कि पर्यावरण-अनुकूल और आकर्षक डिजाइनों वाली प्रतिमाओं की भी मांग कर रहे हैं। इसके चलते कलाकार नई शैली, आधुनिक रंग-सज्जा और अलग-अलग आकार की प्रतिमाएं तैयार कर रहे हैं। उनका मानना है कि इस बदलती मांग ने उनकी कला को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है।
कुम्हारटोली करीब तीन सौ वर्षों से मूर्तिकला की अपनी समृद्ध परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यहां तैयार होने वाली दुर्गा प्रतिमाएं देश ही नहीं, विदेशों तक भेजी जाती हैं। अब गणपति प्रतिमाओं की बढ़ती मांग ने इस पारंपरिक शिल्प केंद्र को वर्षभर काम मिलने की नई संभावना प्रदान की है।
स्थानीय कलाकारों का मानना है कि यदि इसी तरह देशभर से ऑर्डर मिलते रहे तो इस वर्ष त्योहारी सीजन उनके लिए पिछले कुछ वर्षों की तुलना में अधिक लाभदायक साबित हो सकता है। उनके अनुसार, गणपति प्रतिमाओं की बढ़ती मांग यह भी दर्शाती है कि कुम्हारटोली की कला अब क्षेत्रीय सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय पहचान बना चुकी है।