मधुर, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : तृणमूल कांग्रेस बोर्ड वाले कोलकाता नगर निगम में पिछले 16 वर्षों के दौरान कथित वित्तीय अनियमितताओं की जांच के लिए पांच सदस्यीय विशेष जांच समिति गठित की गई है। आरोप है कि कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों, एजेंसी के जरिए नियुक्त कर्मियों और 100 दिन रोजगार से जुड़े कर्मचारियों की कथित फर्जी सूची के आधार पर सरकारी खजाने से अतिरिक्त रकम निकाली गई। केएमसी सूत्रों के अनुसार, विशेष आयुक्त सौम्य भट्टाचार्य ने जांच समिति का गठन किया है। समिति यह पता लगाएगी कि निगम में वास्तविक कर्मचारियों की संख्या और वेतन मद में खर्च हुई राशि के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है।
वेतन खर्च के आंकड़ों से उठा सवाल
केएमसी की प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि पिछले करीब 15 वर्षों में स्थायी कर्मचारियों की संख्या में बहुत अधिक वृद्धि नहीं हुई। इसके उलट, कॉन्ट्रैक्ट और एजेंसी के माध्यम से कर्मचारियों की नियुक्ति पर निर्भरता बढ़ती गई। हाल में वेतन खर्च का हिसाब खंगालने के दौरान अधिकारियों की नजर इस बात पर गई कि अस्थायी कर्मचारियों की अनुमानित संख्या के मुकाबले वेतन के मद में काफी अधिक राशि निगम के खजाने से निकली है। इसके बाद एजेंसी के जरिए नियुक्त कर्मचारियों में संभावित वित्तीय अनियमितता की आशंका जताई गई।
फिलहाल 14 हजार से कम स्थायी कर्मचारी
सूत्रों के अनुसार वर्तमान में केएमसी में 14 हजार से कुछ कम स्थायी कर्मचारी हैं, जबकि अस्थायी कर्मचारियों की संख्या 16 हजार से है। इसके अलावा 100 दिन रोजगार योजना से जुड़े बड़ी संख्या में कर्मचारी भी हैं। जांच समिति यह पता लगाएगी कि निगम के विभिन्न हिस्सों में वास्तव में कितने कर्मचारी कार्यरत हैं और उनके नाम पर कितना भुगतान किया जा रहा है।
बायोमेट्रिक अटेंडेंस की होगी जांच
जांच के दौरान कई स्तरों पर कर्मचारियों से जुड़ा रिकॉर्ड खंगाला जाएगा। जिनमें स्थायी और अस्थायी कर्मचारियों की वास्तविक संख्या, सीधे कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्त कर्मचारियों का विवरण, एजेंसियों के माध्यम से नियुक्त कर्मियों की संख्या, विभिन्न सरकारी योजनाओं के तहत काम करने वाले कर्मचारियों का रिकॉर्ड, कर्मचारियों की बायोमेट्रिक अटेंडेंस, कर्मचारियों के नाम पर किए गए वेतन भुगतान, जांच के दायरे में केएमसी के वार्ड कार्यालय, बोरो कार्यालय, विभिन्न विभागीय कार्यालय, केएमसी के अधीन संस्थान और मुख्यालय के कर्मचारी संबंधी रिकॉर्ड भी शामिल किए गए हैं।
एजेंसी के जरिए नियुक्तियों पर विशेष नजर
केएमसी में स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति की तुलना में पिछले वर्षों में एजेंसी के माध्यम से कॉन्ट्रैक्ट कर्मियों पर अधिक निर्भरता रही है। निगम प्रशासन की ओर से इसके पीछे वित्तीय दबाव का तर्क दिया जाता रहा है। स्थायी कर्मचारियों को नियुक्त करने पर पीएफ, ग्रेच्युटी और अन्य सरकारी सुविधाओं का खर्च बढ़ने की वजह से संविदा व्यवस्था को प्राथमिकता दिए जाने की बात कही जाती रही है। अब जांच समिति यह पता लगाएगी कि इसी व्यवस्था की आड़ में कहीं फर्जी कर्मचारियों के नाम पर भुगतान या अन्य वित्तीय गड़बड़ी तो नहीं हुई।
रिपोर्ट के आधार पर होगी आगे की कार्रवाई
केएमसी सूत्रों के अनुसार, कर्मचारियों की संख्या और सरकारी खजाने से हुए खर्च में काफी अंतर दिखाई दे रहा है। इसलिए पहले अस्थायी कर्मचारियों की सूची तैयार कर हर कर्मचारी के वास्तविक अस्तित्व और उसके वेतन भुगतान का सत्यापन किया जाएगा। समिति की प्रारंभिक रिपोर्ट सामने आने के बाद उसके आधार पर आगे की कार्रवाई तय की जाएगी। जांच का उद्देश्य पिछले 16 वर्षों के दौरान कर्मचारी नियुक्ति और वेतन भुगतान से जुड़ी संभावित वित्तीय अनियमितताओं की पूरी तस्वीर सामने लाना है।