कोलकाता सिटी

हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: सौरव गांगुली को मिली राहत

परसेप्ट टैलेंट मैनेजमेंट लि. की अपील खारिज

जितेंद्र, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : हाई कोर्ट के जस्टिस देवांशु बसाक और जस्टिस शब्बार रसीदी के डिवीजन बेंच के फैसले से क्रिकेटर सौरव गांगुली को भारी राहत मिली है। डिवीजन बेंच ने पर्सेप्ट टैलेंट मैनेजमेंट लिमिटेड और एक अन्य की अपील खारिज करते हुए सिंगल बेंच के फैसले को बहाल रखा है। डिवीजन बेंच ने 2018 के आर्बिट्रल अवॉर्ड को बरकरार रखा है। क्रिकेटर सौरव गांगुली की ओर से वरिष्ठ एडवोकेट सम्राट सेन, एडवोकेट परितोष सिन्हा, मनाली बोस, अमिताव मित्रा, उर्मी सेनगुप्ता, सौरथ दत्त तथा नमन अग्रवाल उपस्थित हुए।

यह विवाद 2003 के प्लेयर रिप्रेजेंटेशन एग्रीमेंट (पीआरए) से जुड़ा है, जिसमें गांगुली ने पर्सेप्ट को अपना एकमात्र मैनेजर नियुक्त किया था। एग्रीमेंट के तहत व्यक्तित्व के व्यावसायिक शोषण से होने वाली आय पर राजस्व बंटवारा तय था। एस्क्रो खाते में जमा राशि पर विवाद हुआ, जब गांगुली ने आरोप लगाया कि बकाया न्यूनतम गारंटीड राशि (एमजीडी) का भुगतान नहीं हुआ और अनधिकृत निकासी की गई। विवाद तब और बढ़ा जब 2006 में गांगुली छह महीने से अधिक भारतीय टीम से बाहर रहें थे।

पीआरए के क्लॉज 2.2 (सी) (ii) के तहत कंपनी को समाप्ति का अधिकार था, लेकिन 21 नवंबर 2007 को घटना के 16 माह बाद नोटिस दी गई थी। आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल ने समाप्ति अमान्य मानी, क्योंकि कंपनी ने तत्काल कार्रवाई नहीं की और बाद में भी गांगुली की डील्स जारी रखीं। सिंगल जज ने जुलाई 2025 में धारा 34 के तहत आवेदन खारिज किया, जिसकी पुष्टि अब डिवीजन बेंच ने की है। कोर्ट ने माना कि आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल का दृष्टिकोण संभव और तर्कसंगत था। समाप्ति का अधिकार 'तत्काल' और 'उचित समय' में प्रयोग करना था, न कि अनिश्चितकाल तक। वेवर, एस्ट्रॉपल और एक्विएसेंस के सिद्धांत लागू किए गए है।

पर्सेप्ट के वकील सूरजित नाथ मित्रा ने क्लॉज का हवाला दिया, लेकिन कोर्ट ने कहा कि अनुबंध की व्याख्या ट्रिब्यूनल का क्षेत्राधिकार है। एक अन्य विवाद कोलकाता नाइट राइडर्स (केकेआर) अनुबंध का था। 21 अगस्त 2008 का यह करार क्रिकेट खेलने का था, न कि व्यक्तिगत प्रचार का। ट्रिब्यूनल ने पर्सेप्ट के 2.62 करोड़ के काउंटर-क्लेम को खारिज किया, क्योंकि प्रचार केकेआर ब्रांड के लिए था। कोलकाता हाईकोर्ट ने इसे व्यावसायिक शोषण से अलग माना। पर्सेप्ट की ऑडिट रिपोर्ट को प्रमाणित न मानने पर भी फैसला बरकरार रहा।

रिपोर्ट की जांचकर्ता को गवाही न देने और क्रॉस-एग्जामिनेशन न होने से अस्वीकार किया। असाइनमेंट के बावजूद दोनों कंपनियां संयुक्त रूप से उत्तरदायी हैं क्योंकि यह मुद्दा आर्बिट्रेशन में नहीं उठाया गया था। ट्रिब्यूनल ने गांगुली को 14,49,91,000 रुपये मुख्य राशि, 21 नवंबर 2007 से 12% ब्याज और 50 लाख लागत प्रदान किया था। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों जैसे एसोसिएट बिल्डर्स, एमएमटीसी आदि का हवाला देकर कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार किया। यह फैसला आर्बिट्रेशन कानून के सीमित हस्तक्षेप को रेखांकित करता है। गांगुली की तरफ से बहस कर रहे एडवोकेट सम्राट सेन ने इसे न्यायपूर्ण फैसला बताया।

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