जितेंद्र, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : राज्य सरकार के आला अफसरों के तबादले को लेकर दायर पीआईएल की सुनवाई सोमवार को अधूरी रह गई। हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस सुजय पाल और जस्टिस पार्थ सारथी सेन के डिविजन बेंच ने आदेश दिया है कि अब इसकी अगली सुनवाई बुधवार को होगी। इस मामले में निर्वाचन आयोग को पार्टी बनाया गया है। इधर निर्वाचन आयोग ने इस पीआईएल की ग्रहणयोग्यता पर सवाल उठाया है।
एडवोकेट अर्क कुमार नाग ने यह पीआईएल दायर की है। पीआईएल के पक्ष में पैरवी करते हुए सीनियर एडवोकेट कल्याण बनर्जी ने कहा कि कमोबेश 75 अफसरों के तबादले किए गए हैं। उनमें मुख्य सचिव, डीजीपी और सीपी भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि इस मनमर्जी से तबादलों के कारण विकास कार्य थम गया है। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि तबादला करते समय कहा गया कि उन्हें चुनावी कार्य से दूर रखा जाए। इसके बाद दूसरे राज्य में ऑवजर्वर बना कर तैनात कर दिया। एडवोकेट जनरल किशोर दत्त की दलील थी कि यह धारणा गलत है कि सारे अफसर चुनाव आयोग के अधीन आते हैं। हकीकत तो यह है कि चुनावी कार्य में तैनात अफसर ही चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। जस्टिस सेन ने एजी से सवाल किया कि इस पीआईएल से राज्य को राहत कैसे मिल सकती है, जबकि जिनका तबादला हुआ है उनमें से किसी ने पीटिशन दायर नहीं किया है। एडवोकेट अनामिका पांडे और सीनियर एडवोेकट एसडी नायडू ने निर्वाचन आयोग की तरफ से पैरवी की। एडवोकेट नायडू की दलील पीआईएल तो उनके लिए दायर की जाती है जो खुद मुकदमा दायर नहीं कर सकते हैं। राज्य सरकार कैसे पीआईएल दायर कर सकती है।पीटिशनर अर्क नाग ने इस तथ्य को छुपाया है कि वे राज्य के लीगल पैनल में हैं। इसके साथ ही कहा कि जिन अन्य राज्यों में चुनाव हो रहे हैं वहां भी अफसरों का तबादला किया गया है। बंगाल कोई अपवाद नहीं है। इस मामले में निर्वाचन आयोग और मुख्य सचिव के बीच के पत्रोचार का हवाला दिया गया है। ये तथ्य उन्हें कहां से मिल गए।