कोलकाता सिटी

नाबालिग साबित करने मेंं लग गए 14 साल

हाई कोर्ट ने दिया रिहाई का आदेश

जितेंद्र, सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : घटना के समय वह नाबालिग था यह साबित करने में एक अभियुक्त को करीब 14 साल लग गए। उसे एक ट्रायल कोर्ट ने आईपीसी की धारा 498ए और 302 के तहत उम्रकैद की सजा सुनायी थी। इसके खिलाफ उसने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। एक लंबे दौर तक चली सुनवाई के बाद जस्टिस राजाशेखर मंथा ने उसे रिहा किए जाने का आदेश दिया है।

एडवोकेट चेतना रुस्तगी ने यह जानकारी देते हुए बताया कि रामपुर ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त को उम्रकैद की सजा सुनायी थी। इसके साथ ही उस पर जुर्माना भी लगाया था। अदा नहीं करने पर अतिरिक्त कैद की सजा सुनायी गई थी। इस मामले में पैरवी कर रहे एडवोकेट डॉ. अचिन जाना की अपील पर जस्टिस मंथा ने रामपुरहाट के फास्ट ट्रैक कोर्ट के एडिशनल सेशन जज को इस बाबत रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया था। अभियुक्त की दलील थी जिस समय यह आपराधिक घटना घटी थी उस समय वह नाबालिग था। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि जिस समय यह घटना घटी थी उस समय अभियुक्त की उम्र 15 साल 9 दिन थी। इस तरह जुवेनाइल एक्ट के तहत वह नाबालिग था और इस एक्ट के तहत किसी नाबालिग को सात साल से अधिक सजा नहीं दी जा सकती है। वह 14 साल से अधिक समय से जेल में है। इसलिए अगर वह और किसी मामले में अभियुक्त नहीं हो तो उसे रिहा कर दिया जाए। उसकी तरफ से दाखिल बेलबांड को रद्द किया जाए। उसने 2014 में जमानत के लिए हाई कोर्ट में पीटिशन दायर किया था, पर यह खारिज हो गया था। उसे अपनी पत्नी की हत्या के आरोप में यह सजा सुनायी गई थी। बहरहाल वह रिहा तो हो जाएगा। आज उसकी उम्र 31 साल के करीब है। उसके जीवन के उन सात वर्षों को कौन लौटाएगा जिसे उसने जेल में गुजारा है।


SCROLL FOR NEXT