कोलकाता : प्रभु श्रीराम की कृपा से जीवन में असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं, लेकिन इसके लिए मनुष्य में अहंकार का त्याग और विनम्रता का भाव होना जरूरी है। हनुमानजी इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं।
उनके भीतर कभी अभिमान नहीं था। यह बात गृहस्थ पुरुषोत्तम तिवारी ने सत्संग भवन के स्वामी कृष्णानंद सभागार में आयोजित श्रीराम कथा के दौरान सुन्दरकाण्ड पर प्रवचन करते हुए कही।
सत्संग भवन ट्रस्ट मंडल एवं स्वामी विश्वदेवानंद चैरिटेबल ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कथा का आयोजन पद्मश्री से सम्मानित साहित्यकार डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र की पावन स्मृति में किया गया।
प्रवचन के दौरान पुरुषोत्तम तिवारी ने हनुमानजी के लंका गमन और सीता की खोज का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जब श्रीराम ने उनसे समुद्र पार करने और लंका दहन करने के बारे में पूछा, तो हनुमानजी ने अत्यंत विनम्रता से इसका श्रेय स्वयं को न देकर प्रभु की कृपा और प्रताप को दिया।
उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को हनुमानजी की तरह अहंकार से मुक्त होकर ईश्वर की कृपा में विश्वास रखना चाहिए।
कार्यक्रम में मेधावी विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर अविनाश गुप्ता, राजू शर्मा, अभय पांडेय, अशोक तिवारी सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन महावीर प्रसाद रावत ने किया।