कोलकाता :
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को लेकर इस बार बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। 2021 में जहां राज्य में 8 चरणों में मतदान हुआ था और करीब एक महीने तक चुनावी प्रक्रिया चली थी, वहीं इस बार चुनाव आयोग ने सिर्फ 2 चरणों में चुनाव कराने का फैसला किया है। करीब 35 साल बाद बंगाल में इतने कम चरणों में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर इस बार 8 की जगह सिर्फ 2 चरणों में वोटिंग क्यों कराई जा रही है।
चुनाव आयोग के मुताबिक पश्चिम बंगाल की 294 विधानसभा सीटों के लिए दो चरणों में मतदान कराया जाएगा।
पहला चरण
23 अप्रैल को मतदान
152 सीटों पर वोटिंग
30 मार्च से 6 अप्रैल तक नामांकन
7 अप्रैल को नामांकन पत्रों की जांच
9 अप्रैल तक नाम वापसी
दूसरा चरण
29 अप्रैल को मतदान
142 सीटों पर वोटिंग
2 अप्रैल से 9 अप्रैल तक नामांकन
13 अप्रैल तक नाम वापसी
इन दोनों चरणों के बाद 4 मई को नतीजे घोषित किए जाएंगे। इसी दिन असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के विधानसभा चुनावों के परिणाम भी आएंगे।
पश्चिम बंगाल में लंबे समय से चुनाव कई चरणों में होते रहे हैं।
2021 – 8 चरण
2016 – 6 चरण
2011 – 6 चरण
2006 – 5 चरण
2001 – 8 चरण
वहीं 1996 में चुनाव 3 चरणों में हुए थे, जबकि 1991 में सिर्फ 2 चरणों में चुनाव कराए गए थे। अब करीब साढ़े तीन दशक बाद फिर से बंगाल में दो चरणों में चुनाव होने जा रहे हैं।
इस बार चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों की मांग और प्रशासनिक जरूरतों को ध्यान में रखते हुए चरणों की संख्या कम करने का फैसला लिया है।
दरअसल, चुनाव आयोग की समीक्षा बैठक में कई विपक्षी दलों ने भी कम चरणों में चुनाव कराने की मांग की थी।
बीजेपी ने 1 या 2 चरणों में चुनाव कराने की अपील की थी
वाम मोर्चा ने एक ही चरण में चुनाव कराने की मांग रखी थी
दलितों का तर्क था कि लंबे समय तक चलने वाले चुनाव में असामाजिक तत्वों को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में जाने का मौका मिल जाता है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के मुताबिक चुनाव को सभी के लिए ज्यादा सुविधाजनक बनाने और चुनावी खिंचाव को कम करने के लिए यह फैसला लिया गया है।
चुनाव आयोग का मानना है कि कम चरणों में मतदान कराने से सुरक्षा बलों की तैनाती बेहतर तरीके से की जा सकेगी। भारी संख्या में केंद्रीय बलों की मौजूदगी से चुनावी हिंसा पर भी नियंत्रण रखने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा कम चरणों में चुनाव कराने से प्रशासनिक बोझ भी कम होता है और सुरक्षा बलों को बार-बार एक जगह से दूसरी जगह भेजने की जरूरत भी कम पड़ती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कम चरणों में चुनाव होने से चुनावी माहौल जल्दी तय हो जाता है। लंबे चरणों वाले चुनाव में कई बार माहौल बदल जाता है।
2021 के चुनाव में भी ऐसा देखने को मिला था। शुरुआती चरणों में एक राजनीतिक दल को बढ़त मिलती दिखाई दी थी, लेकिन जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ा, माहौल बदलता गया और अंतिम नतीजे अलग रहे।