नेशनल जूट बोर्ड की सहायक निर्देशक मौसमी पांडे  
कोलकाता सिटी

जूट से सजे दुर्गा पूजा पंडाल को मिलेगा नेशनल जूट बोर्ड का सम्मान

कोलकाता : वस्त्र मंत्रालय के अधीन नेशनल जूट बोर्ड ने पहली बार परंपरा और पर्यावरण को साथ लेकर चलने की दिशा में एक सराहनीय कदम उठाया है। दुर्गा पूजा के पावन अवसर पर कोलकाता क्षेत्र के पूजा पंडालों के लिए एक विशेष प्रतियोगिता का आयोजन किया गया है, जिसका उद्देश्य जूट से बने सामान के माध्यम से प्रकृति के संरक्षण को बढ़ावा देना है। यह जानकारी नेशनल जूट बोर्ड की सहायक निर्देशक मौसमी पांडे ने सन्मार्ग से खास बातचीत के दौरान दी। आगे उन्होंने कहा कि यह पहल एनजेबी के सेक्रेटरी शशि भूषण सिंह की देखरेख में पहली बार की जा रहा है। इस साल सफल होने पर पूरे बंगाल में इस प्रतियोगिता का अयोजन किया जाएगा। इस प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए पूजा पंडालों को अपनी सजावट में जूट के कपड़े (कम से कम 200 मीटर), जूट की रस्सी या धागा (न्यूनतम 25 किलोग्राम), अथवा कच्चे जूट (25 किलोग्राम) अथवा इन तीनों के मिश्रण का उपयोग अनिवार्य रूप से करना होगा।वस्त्र मंत्रालय, नेशनल जूट बोर्ड की अनोखी पहल। जूट से दुर्गा पूजा पंडाल बनाने के लिए कई नियम रखे गये है। पंडाल की सजावट में नवाचार, कलात्मकता और जूट के उपयोग की मात्रा के आधार पर मूल्यांकन किया जाएगा। नेशनल जूट बोर्ड द्वारा मनोनीत विशेषज्ञों की एक समिति पंडालों का निरीक्षण करेगी। निर्णायक मंडल का फैसला अंतिम और बाध्यकारी माना जाएगा। निरीक्षण के समय आयोजकों को जूट की खरीद संबंधी बिल या इनवॉयस प्रस्तुत करना अनिवार्य होगा। प्रतियोगिता के विजेताओं को आकर्षक नकद पुरस्कार प्रदान किए जाएंगे। प्रथम पुरस्कार 1.5 लाख, द्वितीय पुरस्कार 1 लाख और तृतीय पुरस्कार 75 हजार रुपये है तथा पाँच सांत्वना पुरस्कार 25 हजार रुपये प्रत्येक के लिए निर्धारित किए गए हैं। प्रतिभागी पूजा समितियों को 15 सितंबर,, दोपहर 3 बजे तक अपनी प्रविष्टियाँ जमा करनी होंगी। इस पहल का उद्देश्य परंपरा को जीवित रखते हुए पर्यावरण की रक्षा करना है।

पटसन भवन में लगी प्रदर्शनी

पहली बार जूट से बने दुर्गा पूजा पंडाल को मिलेगा पुरस्कार

पहली बार जूट से बने दुर्गा पूजा पंडाल को मिलेगा पुरस्कार, जो पर्यावरण-संवेदनशीलता और नवाचार का प्रतीक है। यह पहल न केवल पारंपरिक कला को बढ़ावा देती है, बल्कि प्लास्टिक मुक्त उत्सव की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। स्थानीय कारीगरों ने इसमें महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

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