कोलकाता : कोलकाता नगर निगम (केएमसी) के वार्डों की संख्या 144 से बढ़ाकर 209 करने के परिसीमन मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वार्डों की सीमाएं किस तरह तय होंगी, यह राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र का विषय है। अदालत का काम परिसीमन की प्रक्रिया का तरीका निर्धारित करना नहीं है। इसी बीच, एकल पीठ के आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ में नई याचिका दायर की गई है।
मामले में केएमसी के वार्डों के पुनर्गठन के लिए 11 सितंबर को जारी अधिसूचना को चुनौती दी गई है। कोलकाता निवासी दीपू दास ने न्यायमूर्ति हिरणमय भट्टाचार्य की अवकाशकालीन पीठ में याचिका दाखिल कर परिसीमन प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। उनका कहना था कि निगम के निर्वाचित बोर्ड के भंग होने के बाद नगर आयुक्त को परिसीमन की सिफारिश करने का अधिकार नहीं था।
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि वार्डों का निर्धारण वास्तविक जनसंख्या के बजाय मतदाता सूची के आधार पर किया गया। इससे कई निवासियों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया। उन्होंने वार्डों की भौगोलिक निरंतरता और प्रशासनिक सुविधा की अनदेखी तथा राजनीतिक लाभ के लिए परिसीमन किए जाने का भी आरोप लगाया।
केएमसी की ओर से एडवोकेट जनरल सूरजित नाथ मित्र ने दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 243ZG परिसीमन के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप को सीमित करता है। उन्होंने कहा कि नगर आयुक्त को संबंधित कानून के तहत परिसीमन की सिफारिश करने का अधिकार है।
एकल पीठ ने अंतरिम रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा था कि वैधानिक और संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन नहीं होने पर अदालत हस्तक्षेप नहीं कर सकती। अब खंडपीठ ने कहा है कि याचिका पहले से स्वीकार की जा चुकी है और चुनाव की घोषणा होने पर याचिकाकर्ता दोबारा अदालत का रुख कर सकते हैं। मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।