सन्मार्ग संवाददाता
हावड़ा : संत का संग करोगे तो सत्संग मिलेगा और असंत का संग करोगे तो मनोविकार -काम,क्रोध आदि मिलेगा।संत कभी जीवन में मिले तो उनसे यही मांगिए कि कैसे भगवत प्राप्ति होगी? आजकल बहुत से लोग साधु-संतों के पास चमत्कार के लिए जाते हैं।संत वही जिसके दर्शन मात्र से भागवत प्रेम हृदय में उदित हो जाय। संत के पास जाना आपके पुण्यों का प्रभाव है और संत का आपके पास आना प्रभु कृपा है।
वनवास यात्रा में भगवान राम वाल्मीकि मुनि के आश्रम पहुंचते हैं, पूछते हैं , हे मुनि! मैं कहां निवास करूं? वाल्मीकि ने कहा,प्रभु!कौन सा स्थान है,जहां आप नहीं।हे राम! मैं आपको बतलाता हूं कि आप सीताजी और लक्ष्मणजी के साथ 14 स्थान पर निवास कीजिए :-पहला,आप वहां रहें जिनके कान आपकी कथा निरन्तर कथा श्रवण करते हैं, जो नेत्र आपके दर्शनों से अघाते नहीं हैं आदि (उनके हृदय में निवास कीजिए।)
इधर सुमंत्र अयोध्या पहुंच कर राजा दशरथ को रामजी का समाचार सुनाते हैं। दशरथ जी समझ गए अब राम नहीं आएगा। राम के बिना मैं जीवित नहीं रह सकता। राम, राम,राम,राम,राम,राम कहकर दशरथ जी बैकुंठधाम चले गए। कौशल्या सुमित्रा से विलखती हुई बोली ,अब अवध अनाथ हो गया। दुखद समाचार सुनकर गुरु वशिष्ठजी आए,परिजनों व रानियों को समझाने लगे,बोले संसार में जो जन्म लेता है, उसको एक दिन जाना होता है।यह कहकर वशिष्ठ जी रोने लगे।मृत्यु उसकी वंदनीय है जिसकी मौत पर साधु रोता है।
बंग भूमि स्वामी विवेकानंद की कर्मभूमि है, जिन्होंने विश्व को सनातन धर्म के बारे में बताया,जगाया। स्वामी विवेकानंद को जैसे पता चला कि खेतड़ी नरेश अजीत सिंह का निधन हो गया तो वे रोने लगे। लोगों को आश्चर्य हुआ कि एक सांसारिक आदमी के मरने पर एक संन्यासी रो रहा है। किसी ने पूछा तो स्वामी विवेकानंद ने कहा कि पहले मैं एक प्रेमी हूं,बाद में संन्यासी। सांसारिक और साधु-संत के शब्दों का अर्थ अलग-अलग होता है। भरत संत हैं। जैसे ही मामा के घर से अयोध्या आए। कैकेयी के महल में गए। चारों तरफ सन्नाटा।
पूछने पर कैकेयी ने सारी कथा कह दी। जैसे ही भरत ने सुना कि मैं राजा बनूं इसलिए मेरे राम को 14 वर्ष का वनवास। भरत क्रोधित होकर कैकेयी से बोले,अरे पापिनि! तूने मेरे कुल का नाश कर दिया। ब्रह्मा जी ने हमें सब अच्छा दिया पर मुझे तेरा पुत्र क्यों बनाया? तू अब मेरी मां नहीं और न ही मैं तेरा बेटा। कैकेयी बोली, जिसे वनवास दिया ,वह राम कठोर वचन नहीं बोला। भरत जी कठोर इसलिए बोले कि कैकेयी पुन:राम से जुड़ जाए।संत वही जो साधक को भगवान से जोड़ता है। भरत परम संत हैं। ये बातें रजत जयंती वर्ष के उपलक्ष में सुन्दरकाण्ड भक्त मण्डल, कोलकाता के तत्वावधान में श्रीराम कथा पर प्रवचन करते हुए परम पूज्य संत मुरलीधर महाराज ने हनुमंतधाम (फोरशोर रोड,शिवपुर) में कही।
कार्यक्रम का संचालन भागवत मर्मज्ञ हरीश तिवाड़ी ने किया। श्रीरामकथा को सफल बनाने में आयोजन समिति के संरक्षक श्याम सुन्दर अग्रवाल,मुख्य यजमान आशाराम झंवर व संदीप गुप्ता, दैनिक यजमान सोमनाथ आडूकिया व राजेश मूंधड़ा, संस्था के अध्यक्ष पवन कुमार ताम्बी,सचिव शिवशंकर लाहोटी,आयोजन समिति के अध्यक्ष श्याम सुन्दर तोषनीवाल,सचिव ललित कुमार सिंघी सहित अन्य सदस्य सक्रिय हैं। इस अवसर पर राष्ट्रीय पुस्तकालय के महानिदेशक प्रोफेसर अजय प्रताप सिंह, विनोद बागड़ोदिया, पार्षद विजय ओझा, हरिशंकर झंवर, सांवरमल अग्रवाल, सुनील बंसल, दिनेश भारूका, रामानंद रस्तोगी, नंद किशोर राकावत, पुरुषोत्तम तिवारी, महावीर प्रसाद रावत, आचार्य राकेश पाण्डेय, सहित अन्य गणमान्य लोग मौजूद रहे।