सन्मार्ग संवाददाता
काेलकाता : West Bengal की धरती का इतिहास शौर्य, कला, साहित्य और खेल भावना से समृद्ध रहा है। एक समय ऐसा था जब भारतीय फुटबॉल, एथलेटिक्स और क्रिकेट की धड़कनें Kolkata के मैदानों से तय होती थीं। P. K. Banerjee, Chuni Goswami, Shailen Manna से लेकर Sourav Ganguly, Jhulan Goswami और Dipa Karmakar जैसे दिग्गजों ने विश्व पटल पर बंगाल का नाम गौरवान्वित किया। लेकिन बीते कुछ दशकों में यह कड़वा सच भी सामने आया कि पर्याप्त आर्थिक सहायता, आधुनिक खेल ढांचे और भविष्य की सुरक्षा के अभाव में राज्य की युवा प्रतिभाएं खेलों को पूर्णकालिक करियर के रूप में अपनाने से हिचकने लगी थीं।
special Olympics एवं Para olympics भी अहम है। इस बारे में पी के पाटोदिया ने कहा कि हाल ही में राज्य के खेल मंत्री Nisith Pramanik द्वारा की गई ऐतिहासिक घोषणा ने इस दिशा में एक क्रांतिकारी कदम उठाया है। सरकार ने ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाले राज्य के खिलाड़ियों के लिए ₹8 करोड़ की भारी-भरकम पुरस्कार राशि देने का ऐलान किया है। साथ ही विश्व चैंपियनशिप, Asian Games और Commonwealth Games के पदक विजेताओं के लिए भी पुरस्कार राशि में कई गुना वृद्धि की गई है। यह पहल न केवल सराहनीय है, बल्कि बंगाल के खेल इतिहास में एक स्वर्णिम अध्याय की शुरुआत भी है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि बंगाल के गांवों, कस्बों और शहरों की गलियों में अद्भुत खेल प्रतिभाएं छिपी हुई हैं। उत्तर बंगाल के चाय बागानों से लेकर सुंदरबन के सुदूर द्वीपों और जंगलमहल के आदिवासी इलाकों तक युवाओं में स्वाभाविक रूप से असाधारण शारीरिक क्षमता और संघर्षशीलता मौजूद है।
फिर भी, खेल को करियर बनाने का रास्ता हमेशा अनिश्चितताओं से भरा रहा। मध्यमवर्गीय और गरीब परिवारों के बच्चों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बेहतर डाइट, प्रशिक्षण और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा की होती है। जब तक खिलाड़ियों को यह भरोसा नहीं मिलेगा कि उनकी मेहनत का उचित सम्मान और मूल्यांकन होगा, तब तक अभिभावक भी अपने बच्चों को खेल के मैदान में पूरी तरह आगे बढ़ाने का साहस नहीं कर पाएंगे।
₹8 करोड़ की यह प्रोत्साहन राशि उसी मानसिक बाधा को तोड़ने का काम करेगी। यह फैसला युवा खिलाड़ियों को यह स्पष्ट संदेश देता है कि सरकार उनके साथ खड़ी है और खेल अब केवल शौक नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य से जुड़ा एक मजबूत करियर विकल्प बन चुका है।