सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता :
भारत सरकार ने गैर-बासमती चावल के निर्यात को नियंत्रित करने के लिए APEDA (कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण) में पूर्व-पंजीकरण अनिवार्य कर दिया है। यह निर्णय देश के चावल निर्यात पर बेहतर निगरानी और रणनीतिक नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
सरकार के इस फैसले का उद्देश्य फिलहाल कोई प्रतिबंध लगाना नहीं, बल्कि निर्यात की मात्रा और गंतव्य पर सटीक जानकारी और विश्लेषण प्राप्त करना है। हालांकि, हितधारकों का मानना है कि इससे व्यापार पर तत्काल कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ेगा, और केवल ₹8 प्रति मीट्रिक टन की नाममात्र लागत जुड़ेगी।
चावल व्यवसायी ने कहा, "यह एक अतिरिक्त प्रक्रिया भर है। इससे न तो निर्यात प्रभावित होगा और न ही निर्यातकों पर कोई भारी बोझ पड़ेगा। इसका मुख्य लाभ सरकार को मिलेगा, जिससे वह गैर-बासमती चावल की निर्यात नीति को बेहतर तरीके से नियंत्रित और लागू कर सकेगी, जैसे कि बासमती चावल के मामले में होता है।"
विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) द्वारा बुधवार को जारी अधिसूचना के अनुसार, गैर-बासमती चावल के निर्यात से पहले अनुबंधों का एपीडा में पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है। यह प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन होगी और पंजीकरण प्रमाणपत्र त्वरित रूप से जारी किए जाएंगे।
उद्योग सूत्रों के मुताबिक, इस पहल के पीछे सरकार की मंशा दोहरी है — एक ओर निर्यात पर निगरानी को सशक्त बनाना, और दूसरी ओर एक "राइस ट्रेड प्रमोशन फंड" (चावल व्यापार संवर्धन निधि) की स्थापना करना, जो भविष्य में चावल निर्यात को प्रोत्साहन देने में सहायक होगा।
भारत विश्व का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है। ऐसे में गैर-बासमती चावल, जो कुल चावल निर्यात का एक बड़ा हिस्सा है, पर नियंत्रण रखने से सरकार को संकट के समय नीतिगत निर्णय लेने में सुविधा होगी।
सूरज अग्रवाल का मानना है कि यह कदम सरकार की निर्यात नीति में दीर्घकालिक योजना और पारदर्शिता लाने की दिशा में उठाया गया एक सकारात्मक कदम है।