कोलकाता : महानगर की प्रतिष्ठित विधानसभा सीट भवानीपुर इस समय केवल एक राजनीतिक क्षेत्र नहीं, बल्कि एक ऐसा रणक्षेत्र बन चुकी है, जहां सियासत अपने चरम पर है, लेकिन जमीन पर एक अजीब-सी, गहरी और जड़ें जमाए खामोशी पसरी हुई है मानो कहीं दूर गरजता हुआ तूफान धीरे-धीरे करीब आ रहा हो।
इस हाई-प्रोफाइल मुकाबले के केंद्र में हैं ममता बनर्जी, जिनकी निरंतर सक्रियता ने पूरे क्षेत्र को चुनावी रणनीति का केंद्र बना दिया है। उनका हर दौरा, हर संवाद और कार्यकर्ताओं के साथ हर बैठक यह संकेत देती है कि वे इस सीट को लेकर बेहद सजग और आक्रामक हैं। गलियों से लेकर मुख्य सड़कों तक उनकी मौजूदगी स्पष्ट दिखाई देती है।
दूसरी ओर विपक्षी मोर्चे से शुभेंदु अधिकारी की सक्रियता भी कम नहीं है। उनकी जनसभाएं, तीखे राजनीतिक बयान और लगातार चल रही रणनीतिक गतिविधियां इस सीट को राज्य की सबसे हाई-प्रोफाइल लड़ाइयों में से एक बना देती हैं लेकिन इस शोर के बीच सबसे बड़ा विरोधाभास यहां के निवासियों का मौन है।
चाय की दुकानों, बाजारों और गलियों में चुनावी चर्चा तो है, लेकिन उसमें पहले जैसा उत्साह नहीं दिखता। बातचीत शुरू होती है, लेकिन जल्द ही एक अजीब-सी चुप्पी उसे ढक लेती है। लोग इस स्थिति को “देखो और इंतजार करो” की भावना बताते हैं। देवेंद्र घोष रोड, भवानीपुर पर चुनावी रंग तो हर तरफ दिखाई दे रहे हैं, लेकिन माहौल किसी तरह “ब्लैक एंड व्हाइट” जैसा महसूस होता है।
कुछ दिन पहले चक्रबेड़िया में ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी की आमने-सामने मौजूदगी के बावजूद इलाके में अब गहरा सन्नाटा है। एक चाय विक्रेता ने कहा, “सब कुछ देखा, लेकिन राजनीति में सब सामान्य है। हमने अपना वोट दे दिया है, अब 4 तारीख का इंतजार है।” कोलकाता के पुराने इलाकों में से एक होने के कारण भवानीपुर में कई जगहों पर सौंदर्यीकरण तकनीकी कारणों से संभव नहीं हो सका।
इसी पर पटुआपाड़ा के एक निवासी ने कहा, “यहां एक बड़ा पार्क जरूरी है, जहां बच्चे खेल सकें और लोग खुलकर सांस ले सकें।” आज भवानीपुर दो शक्तियों के बीच स्थिर खड़ा है, एक ओर नेताओं की तीव्र सक्रियता और दूसरी ओर जनता की गहरी खामोशी। और यही खामोशी परिणाम से पहले किसी बड़े राजनीतिक विस्फोट का संकेत देती है।