कोलकाता : तृणमूल कांग्रेस से निष्कासन के बाद अब पूर्व छात्र नेता ऋतब्रत बनर्जी एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। 2017 में सीपीएम से निष्कासित होने के बाद टीएमसी में शामिल हुए ऋतब्रत को हाल ही में तृणमूल ने भी पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में बाहर का रास्ता दिखा दिया।
इसी संदर्भ में टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी के बयान में सीपीएम की तारीफ भी रही। ऋतब्रत के राजनीतिक अतीत का जिक्र करते हुए ममता ने कहा, “पहले तो वह सीपीएम में था। उस समय सीपीएम ने उसे निकालकर बिल्कुल सही काम किया था। कम से कम इस एक मामले में मैं सीपीएम की प्रशंसा करती हूं।”
इसके बाद अब सीपीएम नेताओं ने भी उन पर तीखा हमला बोला है। सीपीएम नेता सुजन चक्रवर्ती ने कहा कि तृणमूल में “निष्कासन का कोई वास्तविक अर्थ नहीं रह गया है।” उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि पार्टी में न तो अनुशासन दिखता है और न ही स्पष्ट संगठनात्मक ढांचा। उनके अनुसार, “जो लोग पहले ही संगठन से दूरी बना चुके हैं, उन्हें अब औपचारिक रूप से हटाने का कोई खास मतलब नहीं रह जाता।”
एसएफआई के अखिल भारतीय महासचिव सृजन भट्टाचार्य ने भी इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पहले ऋतब्रत के राजनीतिक रुख ने उन्हें निराश किया था, लेकिन आज की स्थिति उनके पुराने फैसलों पर सवाल खड़े करती है। उन्होंने कहा कि जो नेता वैचारिक प्रतिबद्धता से समझौता करते हैं, उनका राजनीतिक सफर अक्सर विवादों में घिरा रहता है।
वहीं सीपीएम के एक अन्य युवा नेता शतरूप घोष ने भी ऋतब्रत पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि गद्दार तो गद्दार ही होता है और दो प्रमुख दलों से निष्कासन उनके आचरण पर गंभीर सवाल उठाता है। इस पूरे घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक नयी बहस छेड़ दी है, जहां दल बदल और निष्कासन की राजनीति एक बार फिर चर्चा में है।