सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : पश्चिम बंगाल राज्य विश्वविद्यालय, बारासात (कोलकाता) के हिंदी विभाग तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के संयुक्त तत्वावधान में ‘इक्कीसवीं सदी का साहित्य और भाषा का महत्व’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया। यह संगोष्ठी समकालीन समय में भाषा और साहित्य की बदलती भूमिका तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में उसकी प्रासंगिकता पर गंभीर विमर्श का महत्वपूर्ण मंच सिद्ध हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी के कुलपति प्रो. नवीनचंद्र लोहनी उपस्थित रहें। उन्होंने अपने संबोधन में इक्कीसवीं सदी के साहित्य को समाज के बदलते सरोकारों से जोड़ते हुए भाषा की सृजनात्मक भूमिका पर प्रकाश डाला।
संगोष्ठी का बीज वक्तव्य इग्नू, नई दिल्ली के रजिस्ट्रार तथा प्रसिद्ध कवि-आलोचक प्रो. जितेंद्र श्रीवास्तव द्वारा प्रस्तुत किया गया, जिसमें उन्होंने समकालीन साहित्यिक प्रवृत्तियों और भाषा के परिवर्तित स्वरूप का सूक्ष्म विश्लेषण किया। कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ कवि एवं कथाकार मृत्युंजय सिंह, प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं संपादक प्रबाल बसु तथा वरिष्ठ कवि एवं संपादक अनिल मिश्र ने अपने विचार व्यक्त करते हुए साहित्य की वर्तमान दिशा पर महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ प्रस्तुत कीं। केंद्रीय हिंदी संस्थान, भुवनेश्वर केंद्र के क्षेत्रीय निर्देशक श्री रंजन दास की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम की अकादमिक गरिमा को और समृद्ध किया।
इस अवसर पर हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष एवं प्रख्यात आलोचक प्रो. (डॉ.)अरुण होता की नवीन आलोचनात्मक कृति 'समकालीन कविता का जनतंत्र' का लोकार्पण भी सम्पन्न हुआ, जो कार्यक्रम का एक विशिष्ट आकर्षण सिद्ध हुआ। सेतु प्रकाशन से प्रकाशित इस महत्त्वपूर्ण कृति में प्रो. अरुण होता ने भूमंडलीकरण, बाजारीकरण तथा पर्यावरण संकट जैसे समकालीन प्रश्नों की पृष्ठभूमि में हिंदी कविता का गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
मूलतः यह पुस्तक समकालीन कविता की संवेदना और उसके जन-सरोकारों को विस्तार से समझने की एक सशक्त दृष्टि प्रदान करती है। इसमें केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपेयी, राजेश जोशी, अरुण कमल, दिविक रमेश, मदन कश्यप, निलय उपाध्याय, अनिल मिश्र, हरीशचंद्र पांडेय, जितेंद्र श्रीवास्तव, श्रीप्रकाश शुक्ल, अनिल त्रिपाठी, सुभाष राय तथा सुरेश सेन निशांत आदि कवियों के काव्य-संसार का मूल्यांकन किया गया है। साथ ही समकालीन कविता के आदिवासी और स्त्री स्वरों की भी गंभीर पड़ताल की गई है। सहमति-असहमति की आलोचनात्मक बहसों के माध्यम से यह कृति आलोचना के परिसर को व्यापक बनाती है तथा पाँच पीढ़ियों के कवियों की रचनात्मकता का विवेचन करते हुए आधुनिक एवं समकालीन कविता के जनतांत्रिक सरोकारों को समझने की एक सुदृढ़ दृष्टि प्रस्तुत करती है।
संगोष्ठी के सफल आयोजाकों में विभागाध्यक्ष प्रो. अरुण होता के मार्गदर्शन और दूरदर्शी नेतृत्व की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही, जिनके निर्देशन में पूरा कार्यक्रम सुव्यवस्थित रूप से सम्पन्न हुआ। संगोष्ठी के समन्वयक डॉ. विनोद कुमार के कुशल संयोजन और सतत प्रयासों ने आयोजन को सफल बनाने में प्रमुख योगदान दिया। साथ ही विश्वविद्यालय के शोधार्थियों - श्वेता शर्मा, मनोज कुमार, अरुण तिवारी, नेहा साव, पार्वती कुमारी साव एवं विद्यार्थियों ने आयोजन की व्यवस्थाओं को सुचारु रूप से संचालित करने में सक्रिय भूमिका निभाई, जिसके कारण कार्यक्रम अत्यंत सफल और प्रभावी रूप से सम्पन्न हो सका।