कोलकाता सिटी

आनंद मार्ग प्रचारक संघ का 5 दिवसीय शिक्षा प्रशिक्षण शिविर

सन्मार्ग संवाददाता

कोलकाता : आनंद मार्ग प्रचारक संघ ने कोलकाता स्थित आनंद मार्ग केंद्रीय कार्यालय में पाँच दिवसीय शिक्षा प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया है। कार्यक्रम की शुरुआत प्रभात संगीत, कीर्तन और सामूहिक ध्यान के साथ हुई। आनंद मार्ग की केंद्रीय समिति के सदस्य आचार्य विकाशानंद अवधूत ने कार्यक्रम का उद्घाटन किया। आचार्य तथागतानंद अवधूत ने श्शिक्षकों की भूमिका विषय पर कक्षा ली। उन्होंने कहा कि अभिभावकों की जिम्मेदारियों के बारे में आगे कोई टिप्पणी करने से पहले, शिक्षकों के बारे में कुछ और कहना आवश्यक है।

पहला बिंदु यह है कि शिक्षकों का चयन बहुत सावधानी से किया जाना चाहिए। केवल उच्च शैक्षणिक योग्यताएँ होना ही किसी व्यक्ति को शिक्षक बनने का अधिकार प्रदान नहीं करता। शिक्षकों में व्यक्तिगत ईमानदारी, चरित्र की दृढ़ता, सदाचार, समाज सेवा की भावना, निस्वार्थता, एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व और नेतृत्व क्षमता जैसे गुण अवश्य होने चाहिए। वे समाज गुरु होते हैं, और इसी कारण से किसी भी ऐरे-गैरे व्यक्ति को शिक्षक के रूप में स्वीकार करना संभव नहीं है। क्योंकि शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, इसलिए उनके पेशेवर मानक भी बहुत ऊँचे होने चाहिए।

प्रत्येक देश में शिक्षकों का वेतन, न्यायपालिका और कार्यपालिका में कार्यरत सरकारी कर्मचारियों के वेतन के बराबर या उससे भी अधिक होना चाहिए। यह नहीं भूलना चाहिए कि अतीत के ऋषि-मुनि राजाओं से मंदिर के लिए दान, भूमि के उपहार और नियमित रूप से पुरोहिती शुल्क प्राप्त किया करते थे। उन्हें अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए ट्यूटर के रूप में घर-घर जाकर काम नहीं करना पड़ता था, क्योंकि उनकी सांसारिक समस्याओं को सुलझाने की सीधी जिम्मेदारी सरकार की होती थी।

यद्यपि यह सच है कि ऐसे ऋषि-मुनि अपने शिष्यों को भोजन और वस्त्र प्रदान करते थे, लेकिन इसके लिए धन जनता से आता था और श्रद्धापूर्वक दान किया जाता था। हालाँकि, केवल शिक्षकों का वेतन बढ़ा देने का यह अर्थ स्वतः ही नहीं हो जाता कि उन्हें आदर्श स्त्री-पुरुषों के निर्माण का अवसर मिल जाएगां क्योंकि आज दुनिया के अधिकांश देशों में (जहाँ शिक्षकों को आम तौर पर काफी अच्छी तरह से जीवन यापन करने का अवसर मिलता है) शिक्षकों के पास फिर भी शैक्षिक नीतियाँ बनाने का अधिकार नहीं है।

इसके विपरीत, शैक्षिक नीतियाँ आम तौर पर पेशेवर राजनेताओं द्वारा बनाई जाती हैं, जिनमें से अधिकांश के पास शायद शिक्षा के क्षेत्र में कोई अनुभव ही नहीं होता। यदि शिक्षकों को आदर्श स्त्री-पुरुषों के निर्माण के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना है, तो उन्हें केवल एक शिक्षण मशीन बने रहने के बजाय, शैक्षिक नीतियाँ बनाने का अधिकार भी अवश्य दिया जाना चाहिए। इसकी जानकारी आचार्य दिव्यचेतनानंद अवधूत, केंद्रीय जनसंपर्क सचिव ने दी।

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