बंदूक की जगह मछली पकड़ने का जाल थामा 
झारखंड

बंदूक छोड़ चुके पूर्व-नक्सलियों को खूब भा रहा मछलीपालन

2002 में वामपंथी उग्रवाद को छोड़ने से पहले नक्सली समूह का हिस्सा थे

Santosh Sharma

गुमला : झारखंड में पहले उग्रवाद का रास्ता अपना चुके कई लोग अब केंद्र सरकार की एक योजना के तहत बंदूक की जगह मछली पकड़ने का जाल थामने लगे हैं। इस पहल ने इस क्षेत्र को नक्सल-प्रभावित क्षेत्रों की सूची से हटाने में योगदान दिया है। गुमला जिले के बसिया ब्लॉक के निवासी ज्योति लकड़ा वर्ष 2002 में वामपंथी उग्रवाद को छोड़ने से पहले एक नक्सली समूह का हिस्सा थे। आज, वे एक मछली चारा मिल चलाते हैं, जिससे उन्हें पिछले साल केंद्र की प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) योजना के तहत करीब आठ लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा हुआ।

अपनी चारा मिल के लिए 18 लाख रुपये का अनुदान प्राप्त करने वाले 41 वर्षीय लकड़ा ने कहा, आस-पास मछली का चारा बेचने वाली कोई दुकान नहीं थी। ग्रामीणों को मछली का चारा खरीदने के लिए 150 किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। इसलिए मैंने मछली चारा मिल लगाने का फैसला किया। संयुक्त केंद्रीय और राज्य कार्यान्वयन के साथ वर्ष 2020-21 में शुरू की गई पीएमएमएसवाई योजना ने चार वर्षों में गुमला जिले में 157 व्यक्तिगत लाभार्थियों को प्रशिक्षित किया है।

जिला मत्स्य अधिकारी कुसुमलता ने कहा कि जिले में अब मछली पालन में लगे 8,000-9,000 परिवारों में से लगभग 25 प्रतिशत पूर्व नक्सली समर्थक या भागीदार हैं। मई 2025 में गुमला को रांची जिले के साथ केंद्रीय गृह मंत्रालय की नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की सूची से हटा दिया गया। इस क्षेत्र में वामपंथी उग्रवाद में उल्लेखनीय गिरावट आई है।

स्थानीय अधिकारियों का कहना है कि जहां कभी ‘दस में से आठ परिवारों’ की ‘क्रांतिकारी’ जीवनशैली हुआ करती थी, वहां के वीरान गांवों को फिर से आबाद किया गया है, स्कूल और अस्पताल दोबारा खोले गए हैं और कृषि गतिविधियां भी बहाल हो गई हैं। एक और पूर्व नक्सली 42 वर्षीय ईश्वर गोप भी अब एक सरकारी तालाब से सालाना 2,50,000 रुपये की आठ क्विंटल मछलियां पकड़ते हैं, जिसे उन्होंने तीन साल की अवधि के लिए 1,100 रुपये में पट्टे पर लिया है। पच्चीस एकड़ कृषि भूमि के मालिक गोप ने यह अहसास हुआ है कि मछली पालन पारंपरिक कृषि से अधिक लाभदायक है।

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