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महिला आरक्षण विधेयक न पारित होने पर झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्रियों का ‘INDIA’ गठबंधन पर हमला

महिला आरक्षण विधेयक गिरने पर रघुबर दास और चंपई सोरेन ने विपक्ष को घेरा

जमशेदपुर : झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्रियों और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेताओं ने 2029 से लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने संबंधी संविधान संशोधन विधेयक के पारित नहीं होने के लिए कांग्रेस और ‘INDIA’ (इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस) गठबंधन के अन्य घटक दलों की कड़ी आलोचना की।

पूर्व मुख्यमंत्री रघुबर दास ने कहा कि महिलाओं को उचित अधिकार देने के मामले में 'तथाकथित महिला-हितैषी दलों' का असली रंग सामने आ गया है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन ने लोकसभा में विधेयक को पारित होने से रोकने के लिए विपक्षी दलों की आलोचना करते कहा कि यह नारी शक्ति का ‘अपमान’ है।

लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण 2029 के चुनावों से लागू करने और लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाकर 816 करने संबंधी संविधान संशोधन विधेयक शुक्रवार को संसद के निचले सदन में पारित नहीं हो पाया।

सदन में ‘संविधान (131वां) संशोधन विधेयक 2026’, पर हुए मत विभाजन के दौरान इसके पक्ष में 298 और विरोध में 230 वोट पड़े। लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक को पारित करने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत होती है। विधेयक पर मत विभाजन में 528 सदस्यों ने हिस्सा लिया। इस विधेयक को पारित करने के लिए 352 सदस्यों के समर्थन की आवश्यकता थी।

दास ने कहा, यह महिलाओं के साथ विश्वासघात है। यह सिर्फ एक विधेयक की हार नहीं है, बल्कि उन लाखों महिलाओं के सपनों का विश्वासघात है जो लंबे समय से आरक्षण का इंतजार कर रही हैं। देश याद रखेगा कि महिलाओं के अधिकारों का समर्थन किसने किया और किसने राजनीति की खातिर उन्हें कुचल दिया। उन्होंने जोर देकर कहा कि ‘नारी शक्ति’ महिला-विरोधी ताकतों को कभी माफ नहीं करेगी।

सोरेन ने कहा, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) और समाजवादी पार्टी ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम के लिए आवश्यक संविधान संशोधन विधेयक को पारित नहीं होने दिया।

उन्होंने यह भी दावा किया कि कांग्रेस और उसके सहयोगियों ने ऐसा पहली बार नहीं किया है। उन्होंने कहा कि नारी शक्ति के इस अपमान का असर दूरगामी होगा।

सोरेन ने कहा, विपक्ष को न केवल 2029 के लोकसभा चुनावों में, बल्कि हर स्तर पर और हर चुनाव में महिलाओं के प्रकोप का सामना करना पड़ेगा।

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