मानसून में बार-बार भूस्खलन से जान-माल और सड़क संपर्क को खतरा
जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान से लेकर ढलानों को स्थिर करने तक आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों पर चर्चा
आइजोल/नई दिल्ली :
मिजोरम सरकार राज्य में बार-बार होने वाले भूस्खलन की समस्या से निपटने और आपदा-सहिष्णु बुनियादी ढांचे के विकास के लिए एनबीसीसी (इंडिया) लिमिटेड की तकनीकी विशेषज्ञता लेने की संभावनाएं तलाश रही है। इस संबंध में राज्य के आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास मंत्री प्रो. लालनीलावमा ने शुक्रवार को नई दिल्ली स्थित मिजोरम हाउस में एनबीसीसी के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक डॉ. के.पी. महादेवस्वामी के साथ उच्चस्तरीय बैठक की। इसमें भूस्खलन के जोखिम को कम करने, संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने और दीर्घकालिक सुरक्षा उपायों को विकसित करने के लिए संभावित तकनीकी सहयोग पर चर्चा हुई।
मानसून में भूस्खलन से बढ़ती हैं चुनौतियां
बैठक में प्रो. लालनीलावमा ने कहा कि मिजोरम में विशेषकर मानसून के दौरान बार-बार भूस्खलन होने से लोगों की जान-माल, सड़कें, सार्वजनिक बुनियादी ढांचा, आवासीय क्षेत्र और आवश्यक परिवहन संपर्क प्रभावित होते हैं। ऐसी परिस्थितियों में केवल आपदा के बाद मरम्मत और अस्थायी राहत उपाय पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन, योजनाबद्ध हस्तक्षेप और दीर्घकालिक समाधान जरूरी हैं।उन्होंने जोर दिया कि राज्य में भूस्खलन की आशंका वाले क्षेत्रों के लिए ऐसी रणनीति अपनाई जानी चाहिए, जिससे संवेदनशील बस्तियों और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को स्थायी सुरक्षा मिल सके। सरकार का उद्देश्य आपदा के बाद होने वाले नुकसान की भरपाई तक सीमित रहने के बजाय जोखिम को पहले ही कम करना है।
जोखिम वाले क्षेत्रों की वैज्ञानिक पहचान पर जोर
बैठक में एनबीसीसी की तकनीकी विशेषज्ञता का उपयोग करते हुए भूस्खलन के खतरे का मानचित्रण करने, भूवैज्ञानिक एवं भू-तकनीकी सर्वेक्षण कराने और पहाड़ी ढलानों की स्थिरता का आकलन करने जैसे विषयों पर चर्चा हुई। इसके अलावा, अधिक जोखिम वाले स्थानों की पहचान कर प्रत्येक क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप अलग-अलग शमन योजनाएं तैयार करने की संभावनाओं पर भी विचार किया गया।इन अध्ययनों के माध्यम से यह समझने में मदद मिल सकती है कि किन स्थानों पर मिट्टी और चट्टानों के खिसकने का खतरा अधिक है तथा किन सड़कों, बस्तियों और सार्वजनिक परिसंपत्तियों को प्राथमिकता के आधार पर सुरक्षा की जरूरत है। क्षेत्रवार तकनीकी आकलन से उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और जोखिम कम करने के लिए प्रभावी परियोजनाएं तैयार करने में सहायता मिल सकती है।
आधुनिक इंजीनियरिंग तकनीकों से ढलानों को स्थिर करने की योजना
भूस्खलन की रोकथाम के लिए कई आधुनिक इंजीनियरिंग उपायों पर भी चर्चा की गई। इनमें रिटेनिंग वॉल यानी मिट्टी को रोकने वाली दीवारों का निर्माण, गेबियन संरचनाएं, सॉइल नेलिंग, रॉक बोल्टिंग, पहाड़ी ढलानों का स्थिरीकरण और जल निकासी व्यवस्था में सुधार शामिल हैं।गेबियन संरचनाओं में तार की जालियों के भीतर पत्थरों का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि सॉइल नेलिंग और रॉक बोल्टिंग जैसी तकनीकों से मिट्टी तथा चट्टानों को अधिक स्थिर बनाने में मदद मिलती है। बेहतर जल निकासी व्यवस्था से ढलानों में पानी जमा होने और मिट्टी के कमजोर पड़ने के जोखिम को कम किया जा सकता है।हालांकि, इन उपायों का चयन संबंधित स्थान की भूगर्भीय स्थिति, ढलान की बनावट और जोखिम के स्तर के आधार पर किया जाएगा। बैठक में इन तकनीकों को संभावित समाधान के रूप में तलाशने पर चर्चा हुई; इनके क्रियान्वयन के लिए आगे तकनीकी परामर्श और योजना तैयार करने की जरूरत होगी।
राष्ट्रीय भूस्खलन जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम पर भी चर्चा
बैठक में राष्ट्रीय भूस्खलन जोखिम न्यूनीकरण कार्यक्रम (एनएलआरएमपी) को भी प्रमुखता से उठाया गया। इसके तहत मिजोरम के प्राथमिकता वाले भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों के लिए तकनीकी रूप से मजबूत और टिकाऊ शमन प्रस्ताव तैयार करने पर जोर दिया गया।राज्य के आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास विभाग के सचिव सुशील सिंह, आईएएस, ने बैठक में मिजोरम की आपदा संबंधी स्थिति, पहले से चल रही जोखिम न्यूनीकरण पहलों, उनके क्रियान्वयन में आ रही चुनौतियों और आपदा तैयारी को मजबूत करने के प्रयासों की जानकारी दी।एनबीसीसी के वाणिज्यिक निदेशक डॉ. सुमन कुमार, संजय कुमार तथा संगठन के अन्य वरिष्ठ और तकनीकी अधिकारी भी बैठक में उपस्थित थे। अधिकारियों ने राज्य की जरूरतों के अनुरूप तकनीकी सहयोग और उपयुक्त इंजीनियरिंग उपायों की संभावनाओं पर विचार-विमर्श किया।
आपदा-सहिष्णु बुनियादी ढांचे के विकास की पहल
बैठक के बाद राज्य सरकार और एनबीसीसी के बीच आगे तकनीकी परामर्श और सहयोग की संभावनाएं खुली हैं। हालांकि, बैठक में किसी अंतिम समझौते या परियोजना के क्रियान्वयन की औपचारिक घोषणा नहीं की गई।प्रो. लालनीलावमा ने दोहराया कि राज्य सरकार लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, आपदा जोखिम कम करने और बुनियादी ढांचे को अधिक मजबूत बनाने के लिए व्यावहारिक, टिकाऊ और वैज्ञानिक समाधानों को अपनाने के प्रति प्रतिबद्ध है।इस पहल का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि पहाड़ी भूभाग और मानसून के दौरान होने वाली भारी बारिश के बीच सड़क संपर्क, आवासीय क्षेत्रों और सार्वजनिक सुविधाओं की सुरक्षा मिजोरम के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है। एनबीसीसी के साथ संभावित तकनीकी सहयोग से संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, योजनाबद्ध इंजीनियरिंग उपायों और दीर्घकालिक आपदा प्रबंधन रणनीति को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।