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हाथियों से धान बचाने के लिए किसानों ने बनाए 100 से अधिक निगरानी टावर

फसल की रखवाली के लिए रातभर पहरा

KD Parth

पलासबाड़ी :

असम के कामरूप जिले के रानी क्षेत्र में जंगली हाथियों से धान की फसल बचाने के लिए किसान इन दिनों रातभर जागकर खेतों की रखवाली कर रहे हैं। गुवाहाटी के पश्चिमी बाहरी इलाके में असम-मेघालय सीमा के पास स्थित इस प्रमुख कृषि क्षेत्र में धान की खड़ी फसल पकने के करीब है। करीब एक महीने में फसल की कटाई शुरू होने की उम्मीद है। ऐसे में किसानों को आशंका है कि जंगली हाथियों के झुंड उनकी महीनों की मेहनत पर पानी फेर सकते हैं। फसल की सुरक्षा के लिए किसानों ने खेतों और पेड़ों पर बांस, लकड़ी तथा सूखी शाखाओं से 100 से अधिक अस्थायी निगरानी टावर बनाए हैं। रानी क्षेत्र में धान की खेती करने वाले किसानों के सामने हर साल फसल पकने के समय जंगली हाथियों से नुकसान का खतरा पैदा हो जाता है। इस बार भी धान की फसल परिपक्व होने के साथ ही हाथियों की आवाजाही ने उनकी चिंता बढ़ा दी है। किसान शाम होते ही निगरानी टावरों पर पहुंच जाते हैं और सुबह तक बारी-बारी से खेतों पर नजर रखते हैं। किसानों का कहना है कि धान की खेती में महीनों की मेहनत और पूंजी लगती है। फसल तैयार होने के समय हाथियों के हमले से उन्हें भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। यही वजह है कि ग्रामीण अपनी फसल बचाने के लिए रातभर जागने को मजबूर हैं।

बांस और लकड़ी से बने 10 से 20 फीट ऊंचे टावर

फसल की सुरक्षा के लिए निगरानी टावर बनाने की यह पारंपरिक व्यवस्था रानी क्षेत्र में पीढ़ियों से चली आ रही है। किसान बांस, लकड़ी, पेड़ों की शाखाओं और छप्पर की मदद से जमीन से लगभग 10 से 20 फीट की ऊंचाई पर ये अस्थायी संरचनाएं तैयार करते हैं। इन पर बैठकर वे दूर से ही हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखते हैं और उनके खेतों की ओर बढ़ने पर उन्हें भगाने की कोशिश करते हैं। फिलहाल रानी क्षेत्र में ऐसे 100 से अधिक निगरानी टावर बनाए जा चुके हैं। आसपास के गांवों में भी किसान इसी तरीके से अपनी धान की फसल को हाथियों से बचाने का प्रयास कर रहे हैं।

रानी वन क्षेत्र के कई गांव प्रभावित

रानी वन रेंज के अंतर्गत आने वाले कई गांवों में हाथियों के कारण किसानों की परेशानी बढ़ी हुई है। प्रभावित इलाकों में जयपुर, नालापारा, जराशाल गारोपारा, बेलारगुरी, चल्ली, मोइरापुर, सेचा, खापेगांव, घोराईगढ़ोवा जूली, प्राणखुकुआ, मेकुरीकुची, हातिमाराघुली, नोटुन रानी, बामाबहार, पुराना सुकुरबेरिया, पाट हल्दिया और गणपति सहित अन्य गांव शामिल हैं। इन इलाकों में धान के खेतों के आसपास हाथियों की आवाजाही किसानों के लिए लगातार चिंता का विषय बनी हुई है। ग्रामीणों के मुताबिक, हाथियों के खेतों में घुसने से खड़ी फसल को नुकसान पहुंचता है और उनकी सालभर की खाद्य जरूरतों पर भी संकट खड़ा हो जाता है।

आग और पटाखों से हाथियों को भगाने की कोशिश

हाथियों को खेतों से दूर रखने के लिए किसान कई पारंपरिक उपाय अपनाते हैं। इनमें आग जलाना, पटाखे फोड़ना, टिन और बांस पीटना तथा टायर जलाकर शोर पैदा करना शामिल है। कुछ ग्रामीण धनुष-बाण और गुलेल का भी इस्तेमाल करते हैं। हालांकि, इन उपायों से हाथियों के खतरे का स्थायी समाधान नहीं निकल पा रहा है। हाथियों के दोबारा खेतों में पहुंचने से किसानों को लगातार निगरानी करनी पड़ती है। इससे न केवल उनकी नींद प्रभावित होती है, बल्कि दिन के समय खेती और दूसरे कामकाज पर भी असर पड़ता है।

टावरों पर भोजन-पानी लेकर रात बिताते हैं किसान

रातभर खेतों की निगरानी करने वाले किसान अपने साथ पीने का पानी और खाने-पीने की चीजें लेकर चलते हैं। इनमें चावल, चिउड़ा, पीठा, मुरमुरे, बिस्कुट और केले जैसी खाद्य सामग्री शामिल हैं। निगरानी के लंबे घंटों के दौरान इन्हीं के सहारे किसान रात बिताते हैं। धान की फसल कटाई के लिए तैयार होने के करीब है, इसलिए किसान किसी भी तरह अपनी मेहनत की उपज बचाना चाहते हैं। उनके लिए यह फसल केवल आमदनी का साधन नहीं, बल्कि परिवार की सालभर की खाद्य जरूरतों को पूरा करने का भी आधार है।

वन विभाग से अतिरिक्त टीमें तैनात करने की मांग

रानी क्षेत्र में मानव-हाथी संघर्ष धान के मौसम में हर साल गंभीर समस्या बन जाता है। किसानों का कहना है कि केवल पारंपरिक उपायों के भरोसे फसल की सुरक्षा करना मुश्किल हो रहा है। इसलिए उन्होंने वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों से प्रभावित इलाकों में अतिरिक्त टीमों की तैनाती करने की मांग की है, ताकि हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके और फसलों को होने वाले नुकसान को रोका जा सके। ग्रामीणों ने पलासबाड़ी के विधायक हिमांग्शु शेखर बैश्य से भी मामले में हस्तक्षेप करने की अपील की है। किसानों को उम्मीद है कि वन विभाग और जनप्रतिनिधियों की ओर से समय रहते कदम उठाए जाने पर बची हुई फसल को सुरक्षित किया जा सकेगा।

समय पर कार्रवाई से बच सकती है किसानों की मेहनत

किसानों का कहना है कि कटाई से ठीक पहले फसल को नुकसान पहुंचने से उनकी मेहनत और घरेलू खाद्य सुरक्षा दोनों प्रभावित होंगी। ऐसे में वन विभाग की ओर से समय पर प्रभावी कदम उठाना जरूरी है। ग्रामीण चाहते हैं कि धान की कटाई तक खेतों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त निगरानी और सहायता उपलब्ध कराई जाए, ताकि वे अपनी उपज सुरक्षित घर ला सकें।
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