चीन की विशाल बांध परियोजना के जवाब में सियांग पर बांध बनाने की तैयारी
आदिवासी समुदाय विस्थापन और अपनी संस्कृति पर संकट को लेकर कर रहा विरोध
ईटानगर:
अरुणाचल प्रदेश की सियांग घाटी में प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की सियांग अपर मल्टीपर्पज परियोजना (एसयूएमपी) को लेकर विरोध तेज हो गया है। एक ओर राज्य सरकार इसे ऊर्जा सुरक्षा, बाढ़ प्रबंधन और चीन की ओर से ब्रह्मपुत्र के ऊपरी प्रवाह पर प्रस्तावित विशाल जलविद्युत परियोजना के संभावित प्रभावों से निपटने के लिए रणनीतिक रूप से अहम मान रही है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय आदी आदिवासी समुदाय को आशंका है कि बांध से उनके गांव, खेती, आजीविका और पारंपरिक जीवनशैली पर गंभीर असर पड़ेगा। परियोजना की प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट के लिए सर्वेक्षण और ड्रिलिंग की गतिविधियों के बीच सुरक्षा बलों की तैनाती तथा प्रदर्शनकारियों की हिरासत ने विवाद को और बढ़ा दिया है।
सर्वेक्षण के विरोध में प्रदर्शन, चार लोगों को हिरासत में लेने से तनाव
रिपोर्ट के अनुसार, सियांग घाटी के उगेन-कोमकर इलाके में परियोजना की प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार करने के लिए सर्वेक्षण और ड्रिलिंग कराने के उद्देश्य से सुरक्षा बलों की तैनाती की गई। इसके बाद स्थानीय स्तर पर विरोध तेज हुआ। रिपोर्ट में बताया गया है कि 14 अक्टूबर को चार प्रदर्शनकारियों को अरुणाचल प्रदेश गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 2014 के तहत हिरासत में लिए जाने के बाद गेकू और अपर सियांग के अन्य इलाकों में प्रदर्शन हुए। आंदोलन से जुड़े संगठनों ने उनकी रिहाई की मांग की है। इससे पहले सितंबर के अंतिम दिनों में मुख्यमंत्री पेमा खांडू के क्षेत्रीय दौरे के दौरान भी तनाव सामने आया था। प्रदर्शनकारियों ने एक स्थानीय विधायक के आवास पर हमला किया और एक पुलिस वाहन में आग लगा दी। 4 अक्टूबर को फिर झड़पें हुईं। इन घटनाओं के दौरान प्रदर्शनकारियों की ओर से आगजनी और सुरक्षा कर्मियों की ओर से अत्यधिक बल प्रयोग किए जाने के आरोप भी सामने आए हैं।
आदी समुदाय को गांव और पुश्तैनी जमीन डूबने की आशंका
विरोध का सबसे बड़ा कारण संभावित विस्थापन और पारंपरिक जीवन पर पड़ने वाला असर है। आंदोलनकारी संगठनों के दावों के अनुसार, परियोजना का जलाशय करीब 27 गांवों को डुबो सकता है, जबकि इससे कई अन्य गांव भी प्रभावित हो सकते हैं। सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम (एसआईएफएफ) के अनुसार, इससे लगभग एक लाख से डेढ़ लाख तक आदिवासी लोगों के विस्थापित होने की आशंका है। ये आंकड़े आंदोलनकारी संगठन के दावे हैं; अंतिम प्रभाव का आकलन परियोजना संबंधी विस्तृत अध्ययन से ही स्पष्ट होगा। स्थानीय लोगों की चिंता केवल घरों और खेतों तक सीमित नहीं है। आदी समुदाय के लिए सियांग नदी, पुश्तैनी भूमि, धान के खेत, झूम खेती और बागान उनकी संस्कृति तथा सामुदायिक पहचान से गहराई से जुड़े हैं। समुदाय में महत्वपूर्ण फैसले पारंपरिक परिषदों के माध्यम से लिए जाते हैं। अगस्त 2025 में गेकू में आयोजित एक बड़ी पारंपरिक सभा में भी बांध और उसकी प्रारंभिक अध्ययन प्रक्रिया का विरोध किया गया था।
चीन की परियोजना से जुड़ा है रणनीतिक पक्ष
भारत सरकार की चिंता का एक प्रमुख कारण तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी पर चीन की प्रस्तावित विशाल जलविद्युत परियोजना है। यही नदी भारत में प्रवेश करने के बाद सियांग और आगे चलकर ब्रह्मपुत्र कहलाती है। चीन ने दिसंबर 2024 में निचले यारलुंग त्सांगपो क्षेत्र में 60,000 मेगावाट की जलविद्युत परियोजना को मंजूरी दी थी। इसके बाद भारत में नदी के जलप्रवाह, संभावित बाढ़ और जल संसाधनों के प्रबंधन को लेकर रणनीतिक चिंताएं बढ़ी हैं। प्रस्तावित सियांग परियोजना को इसी व्यापक रणनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है। सरकार का तर्क है कि नदी पर भंडारण क्षमता विकसित करने से जल संसाधनों के प्रबंधन और देश की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिल सकती है। हालांकि, चीन की परियोजना से भारत में जलप्रवाह पर वास्तव में क्या प्रभाव पड़ेगा, इसे लेकर अनिश्चितताएं बनी हुई हैं। बांध के समर्थकों और विरोधियों के बीच इस बात पर भी मतभेद है कि चीन की परियोजना के संभावित जोखिमों का जवाब एक विशाल बांध बनाकर देना कितना उचित होगा।
परियोजना पर राजनीतिक रुख भी बदला
सियांग परियोजना को लेकर अरुणाचल प्रदेश की राजनीति में भी बदलाव देखने को मिला है। पहले बड़े बांधों का विरोध करने वाले कुछ नेता अब परियोजना के समर्थन में सामने आए हैं। मुख्यमंत्री पेमा खांडू इसे आगे बढ़ाने के पक्ष में हैं। वहीं, कांग्रेस और स्थानीय संगठनों ने आरोप लगाया है कि प्रभावित समुदायों की सहमति और उनकी चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। पूर्व में बांध विरोधी आंदोलन से जुड़े रहे ओजिंग तासिंग अब राज्य सरकार में मंत्री हैं और परियोजना के समर्थन में चीन की ओर से संभावित जल सुरक्षा संबंधी जोखिमों का हवाला दे रहे हैं। दूसरी ओर, अरुणाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी का कहना है कि चीन की गतिविधियों को आधार बनाकर स्थानीय समुदायों की स्वतंत्र, पूर्व और सूचित सहमति की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।
सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद की कोशिश
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने 8 अक्टूबर को आदी समुदाय के वरिष्ठ सदस्यों से बातचीत करने की अपील की थी। मुख्यमंत्री खांडू ने भी स्थानीय संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक बुलाकर उनकी आशंकाएं दूर करने की कोशिश की। हालांकि, एसआईएफएफ की युवा शाखा ने कुछ शर्तें पूरी होने तक सरकारी बैठक का बहिष्कार करने का आह्वान किया। उसकी मांगों में आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी वापस लेना, हिरासत में लिए गए लोगों की रिहाई और प्रभावित क्षेत्रों से सुरक्षा बलों को हटाना शामिल है। कांग्रेस ने भी सुरक्षा बलों की वापसी और स्थानीय लोगों की स्पष्ट सहमति के बिना परियोजना को आगे नहीं बढ़ाने की मांग की है। दूसरी ओर, राज्य सरकार का कहना है कि परियोजना से रोजगार, आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा मिल सकता है। सरकार के मुताबिक, अभी प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है; परियोजना तकनीकी रूप से व्यवहार्य पाए जाने पर आगे सामाजिक प्रभाव आकलन, पर्यावरण प्रभाव आकलन और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट जैसे चरण होंगे। सियांग घाटी का विवाद अब केवल बांध निर्माण का मुद्दा नहीं रह गया है। इसके केंद्र में राष्ट्रीय सुरक्षा, पर्यावरणीय जोखिम, आदिवासी अधिकार और विकास संबंधी फैसलों में स्थानीय समुदायों की भागीदारी जैसे सवाल हैं। परियोजना को लेकर आगे का रास्ता इस बात पर निर्भर करेगा कि सरकार रणनीतिक जरूरतों और स्थानीय लोगों की चिंताओं के बीच सहमति कैसे बनाती है।