विश्व ओजोन दिवस
वह वर्ष 1985 का एक सामान्य दिन था। मैं कक्षा नौवीं का विद्यार्थी था। सुबह दैनंदिन प्रार्थना के बाद हम सभी विद्यार्थी कक्षा में बैठे विषय सम्बंधित बातचीत में तल्लीन थे कि कक्षाध्यापक उपस्थिति पंजिका लिए कक्षा में दाखिल हुए। हाजिरी भर कर बोले, बच्चो ! पृथ्वी के जीवन पर बहुत बड़ा संकट आ चुका है और तुम लोग बतकही में लगे हो।" कक्षा में सन्नाटा पसरा गया। वह आगे बोले कि पृथ्वी के वायुमंडल में लगभग 20 किमी ऊपर समताप मंडल में 10 से 40 किमी मोटी ओजोन गैस की एक परत होती है जो सूरज से निकलने वाली हानिकारक पैराबैंगनी किरणों को सोख लेती है। यदि ये किरणें सीधे पृथ्वी पर पड़ने लगें तो मनुष्यों को कैंसर और मोतियाबिंद का रोगी बना देंगी और वनस्पति को बहुत क्षति पहुंचेगी। तब पशु-पक्षियों और मनुष्यों का जीवन पर संकट आ जायेगा। अंटार्कटिका क्षेत्र के ऊपर ओजोन परत में बहुत बड़ा छिद्र देखा गया है। यह ओजोन परत के सम्बंध में हमारी पहली जानकारी थी। इतना सुनकर हम बच्चों के दिल-दिमाग में डर की लहर दौड़ गई। जीवन के पांच दशक बाद भी वह डर आज भी हावी है क्योंकि ओजोन परत का छिद्र मानव सभ्यता एवं प्रकृति के लिए संकट बना हुआ मानवीय जीवन शैली को प्रकृति अनुरूप जीने का संकेत कर रहा है और इसीलिए 1995 से प्रत्येक वर्ष 16 सितम्बर को विश्व ओजोन दिवस मनाया जाता है।
विश्व ओजोन दिवस के अवसर पर ओजोन परत के संरक्षण के लिए जन जागरूकता के प्रसार एवं मांट्रियल प्रोटोकाेल की अनुशंसाओं को लागू करने के लिए वैश्विक आयोजन किये जाते हैं। उल्लेखनीय है कि 16 सितम्बर, 1987 को कनाडा के मांट्रियल नगर में आयोजित पर्यावरणीय बैठक में 31 देशों ने सहभागिता करके ओजोन परत में हो रहे छिद्र के समाधान हेतु एक नीतिगत दस्तावेज तैयार किया था जिसे 'मांट्रियल प्रोटोकाेल' कहा जाता है। इसके अंतर्गत ओजोन परत के क्षरण के जिम्मेदार रसायन क्लोरो फ्लोरो कार्बन, हेलॉन, मिथाइल क्लोराइड, मिथाइल ब्रोमाइड और ट्रेटा क्लोराइड के उत्पादन एवं उपभोग को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की पैरवी की गई है। मांट्रियल प्रोटोकाेल को 1 जनवरी, 1989 से लागू किया गया। संयुक्त राष्ट्र संघ के इतिहास में यह सबसे बड़ा पर्यावरण सुधार समझौता कहा जाता है जिसे सभी सदस्य देशों की सहमति-स्वीकृति मिली हुई है। मांट्रियल प्रोटोकाेल का लक्ष्य वर्ष 2050 तक ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाले सभी रसायनों पर नियंत्रण प्राप्त करना है। उल्लेखनीय है कि ओजोन परत की खोज वर्ष 1913 में फैबरी चार्ल्स एवं हेनरी बुसॉन द्वारा की गई थी। ओजोन परत को नापने की इकाई डाब्सन कहलाती है।
यह जानना उपयोगी एवं रोचक होगा कि पृथ्वी के चतुर्दिक पंच स्तरीय वायुमंडल का घेरा होता है। पहली निचली परत 18-20 किमी क्षोभमंडल जहां वर्षा, बादल, आंधी, तूफान आदि क्रियाएं होती है। उसके आगे 15 से 45 किमी समताप मंडल जहां ओजोन द्वारा पराबैंगनी किरणों को सोखा जाता है। यह वायुक्षेत्र विमान उड़ाने के लिए उपयुक्त है।
पाठकों के लिए यह जानना उपयोगी एवं रोचक होगा कि पृथ्वी के चतुर्दिक पंच स्तरीय वायुमंडल का घेरा होता है। पहली निचली परत 18-20 किमी क्षोभमंडल जहां वर्षा, बादल, आंधी, तूफान आदि क्रियाएं होती है। उसके आगे 15 से 45 किमी समताप मंडल जहां ओजोन द्वारा पराबैंगनी किरणों को सोखा जाता है। यह वायुक्षेत्र विमान उड़ाने के लिए उपयुक्त है। उसके आगे 50 से 80 किमी का कम तापमान वाला ठंडा मध्य मंडल का क्षेत्र होता है जहां अंतरिक्ष से गिरने वाले अधिकांश उल्कापिंड प्रवेश करते ही जल जाते हैं। फिर 80 से 600 किमी का आयनित कणों वाला आयन मंडल आता है जो रेडियो तरंगों को परावर्तित कर पृथ्वी पर वापस भेज देता है। 600 से 10000 किमी के विस्तार क्षेत्र वाली अंतिम सबसे ऊपरी परत बहिर्मंडल परत कहलाती है, जहां वायु का प्रतिरोध न के बराबर होता है। यहीं पर कृत्रिम उपग्रह तैरते हुए पृथ्वी का चक्कर लगाते हैं।
समताप मंडल में स्थित ओजोन परत 99 प्रतिशत पराबैंगनी किरणों को अवशोषित कर पृथ्वी के जीवन की रक्षा करती है, इसे पृथ्वी का कवच कहना उचित ही है। मानव निर्मित क्लोरोफ्लोरो कार्बन रसायन कम क्रियाशील होने के कारण क्षोभमंडल पार कर समताप मंडल में पहुंच पराबैंगनी विकिरण से क्रिया करके क्लोरीन मुक्त करती है जो ओजोन का क्षय करती है। ओजोन एक नीले रंग की तीव्र गंध वाली गैस है जो जीवन के लिए अपरोक्ष रूप से ऑक्सीजन से भी अधिक महत्वपूर्ण है। शोध निष्कर्ष है कि 1970 के बाद प्रति दशक 4 प्रतिशत ओजोन क्षय हो रहा है। ओजोन परत में छिद्र सर्वप्रथम 1985 में ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के विज्ञानी दल ने देखा। उनका शोध 'नेचर' पत्रिका में छपने के बाद चर्चा में आया और मांट्रियल प्रोटोकाेल का आधार बना। ओजोन परत में सबसे बड़ा छिद्र दक्षिणी ध्रुव स्थित अंटार्कटिका क्षेत्र के ऊपर वर्ष 2000 में दिखा जो 28.4 मिलियन वर्ग किमी था, जो सामान्यतः भारत के क्षेत्रफल का साथ गुना है।
ओजोन परत में सबसे बड़ा छिद्र दक्षिणी ध्रुव स्थित अंटार्कटिका क्षेत्र के ऊपर वर्ष 2000 में दिखा जो 28.4 मिलियन वर्ग किमी था, जो सामान्यतः भारत के क्षेत्रफल का साथ गुना है।
क्लोरोफ्लोरो कार्बन प्रकृति निर्मित नहीं बल्कि मानव निर्मित रासायनिक यौगिक है जो एयरकंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, शीतल ग्रहों और एरोसोल स्प्रे के डिब्बों में उपयोग किया जाता है जो उत्सर्जित होकर वायुमंडल में पहुंच ओजोन क्षय का कारण बनता है।
ओजोन परत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए आवश्यक है कि क्लोरोफ्लोरो कार्बन के उत्पादन और उपभोग पर नियंत्रण लगाया जाये। क्लोरोफ्लोरो कार्बन प्रकृति निर्मित नहीं बल्कि मानव निर्मित रासायनिक यौगिक है जो एयरकंडीशनर, रेफ्रिजरेटर, शीतल ग्रहों और एरोसोल स्प्रे के डिब्बों में उपयोग किया जाता है जो उत्सर्जित होकर वायुमंडल में पहुंच ओजोन क्षय का कारण बनता है। ग्रीन हाउस गैसें भी ओजोन को नुकसान पहुंचाती हैं। ओजोन परत की रक्षा के लिए आवश्यक है कि मानव प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर सह-अस्तित्व भाव के साथ जीवन यापन करें। भोगवादी जीवन शैली मानव को प्रकृति से दूर करती जा रही है। हमें प्रकृति की ओर लौटना होगा तभी ओजोन संरक्षण हो सकेगा। (युवराज) -प्रमोद दीक्षित मलय